सौरभ शुक्ला की फिल्म 'जब खुली किताब': नाटक से सिनेमा तक की दिलचस्प यात्रा
सौरभ शुक्ला का फिल्मी सफर
मुंबई, 06 मार्च (वेब वार्ता)। प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता और निर्देशक सौरभ शुक्ला ने बताया कि उनके मन में नाटक 'जब खुली किताब' पर फिल्म बनाने का विचार पहले से ही था।
कई बार किसी कहानी की दिशा कैमरे के सामने आने से पहले ही तय हो जाती है। 'जब खुली किताब' की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है।
इसकी शुरुआत थिएटर से हुई और अब यह फिल्म के रूप में दर्शकों के सामने आ चुकी है। सौरभ शुक्ला ने इस फिल्म को लिखा और निर्देशित किया है।
फिल्म का निर्माण अप्लॉज़ एंटरटेनमेंट ने शूस्ट्रिंग फ़िल्म प्रोडक्शन के सहयोग से किया है। यह फिल्म आज ज़ी5 पर रिलीज़ हुई है। खास बात यह है कि यह सौरभ शुक्ला के इसी नाम के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित है।
यह नाटक पहले आद्यम नामक थिएटर पहल के तहत प्रस्तुत किया गया था, जो आदित्य बिड़ला समूह की एक पहल है। नाटक की मजबूत कहानी, हास्य और भावनाओं ने अप्लॉज़ एंटरटेनमेंट का ध्यान आकर्षित किया, जिसके बाद इसे फिल्म में बदलने का निर्णय लिया गया।
सौरभ शुक्ला ने कहा कि नाटक को फिल्म में बदलने का विचार उनके मन में पहले से था। जब समीर उनके पास आए और कहा कि वे इसे फिल्म बनाना चाहते हैं, तो उन्हें मनाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। जब वह इसे लिख रहे थे, तब भी वह इसे फिल्म के रूप में सोच रहे थे। नाटक इसका एक रूप था, लेकिन उन्हें विश्वास था कि यह कहानी फिल्म में भी जीवित रह सकती है।
अप्लॉज़ एंटरटेनमेंट के निदेशक समीर नायर ने कहा, “हम हमेशा ऐसी कहानियों को आगे बढ़ाना चाहते हैं जो दर्शकों के मन में लंबे समय तक बनी रहें। 'जब खुली किताब' में हमें वही अनुभव हुआ।
हमें इसकी कहानी, पात्रों और भावनाओं पर पूरा भरोसा था। इसलिए इसे मंच से फिल्म में लाना हमारे लिए स्वाभाविक था।” अप्लॉज़ एंटरटेनमेंट द्वारा प्रस्तुत और शूस्ट्रिंग फ़िल्म प्रोडक्शन द्वारा निर्मित 'जब खुली किताब' यह दर्शाती है कि अच्छी कहानियाँ माध्यम बदलने से नहीं बदलतीं, बल्कि वे बस लोगों तक पहुँचने का नया तरीका खोज लेती हैं।