सत्यजीत रे की किस्मत बदलने वाला सफेद उल्लू: जानें कैसे बनी 'पाथेर पांचाली'
सत्यजीत रे का अद्भुत सफर
मुंबई, 1 मई। हिंदी सिनेमा में कई निर्देशकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन कुछ ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इनमें से एक प्रमुख नाम है सत्यजीत रे, जिनकी कला और लेखन की अद्भुत क्षमता ने उन्हें खास बनाया।
सत्यजीत रे का जन्म 2 मई, 1921 को कोलकाता के एक समृद्ध परिवार में हुआ। उनके दादा उपेंद्र किशोर रे एक प्रसिद्ध लेखक, चित्रकार और संगीतकार थे। कला उनके खून में थी, जिसने उनके दृष्टिकोण को अद्वितीय बना दिया। ग्राफिक्स डिजाइनर के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले रे को यह नहीं पता था कि वे एक सफल फिल्म निर्देशक बनेंगे। उन्होंने अंग्रेजी फिल्मों का आनंद लिया, लेकिन इटैलियन फिल्म 'बाइसिकल थीव्स' ने उन्हें निर्देशन की ओर प्रेरित किया।
रे ने बंगाली में 'पाथेर पांचाली' फिल्म बनाने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्हें पहले पैसे की आवश्यकता थी, इसलिए उन्होंने अपनी बचत और पत्नी के गहने गिरवी रख दिए। फिल्म निर्माण में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, और एक साल बाद फिल्म का काम रुक गया।
जब पैसे खत्म हो गए, तब एक दिन उन्होंने अपनी खिड़की खोली और वहां एक सफेद उल्लू देखा। यह दृश्य दुर्लभ था, और गांव के लोग इसे देखने के लिए इकट्ठा हो गए। लोगों का मानना था कि यह उल्लू मां लक्ष्मी का प्रतीक है।
उल्लू कई दिनों तक वहीं बैठा रहा, और इसी दौरान पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय ने रे को बुलाकर फिल्म के लिए लोन दिया। इसके बाद 'पाथेर पांचाली' की शूटिंग फिर से शुरू हुई। लोगों ने इसे उल्लू का जादू मान लिया। इस घटना का जिक्र रे की किताब 'माई इयर्स विद अपू' में भी किया गया है।
'पाथेर पांचाली' साधारण फिल्म नहीं थी। इसका प्रीमियर 3 मई, 1955 को न्यूयॉर्क के म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट में हुआ और अगस्त में यह भारत में रिलीज हुई। इसने सत्यजीत रे के करियर की शुरुआत की और भारत को वैश्विक सिनेमा में पहचान दिलाई। फिल्म ने 1956 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में 'सर्वश्रेष्ठ मानवीय दस्तावेज' सहित कई पुरस्कार जीते।