लीला चिटनिस: हिंदी सिनेमा की पहली मां, जिन्होंने दिलों में बसाया अपना नाम
लीला चिटनिस का अद्वितीय सफर
नई दिल्ली, 13 जुलाई। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के 1930 के दशक की प्रमुख हस्तियों में से एक लीला चिटनिस का नाम भी शामिल है। अपनी खूबसूरती, अदाकारी और स्टाइल के लिए जानी जाने वाली लीला ने उस समय में अपार प्रसिद्धि प्राप्त की। पर्दे पर एक ग्लैमरस नायिका के रूप में पहचान बनाने के बाद, उन्होंने मां के किरदारों में ऐसी छाप छोड़ी कि दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गईं। उनकी सादगी और भावनात्मक अभिनय ने हर भूमिका को खास बना दिया।
लीला चिटनिस का जन्म 9 सितंबर 1909 को कर्नाटक के धारवाड़ में एक मराठी परिवार में हुआ। उनके पिता एक अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर थे, जिससे घर में शिक्षा का माहौल था। उस समय जब महिलाओं की शिक्षा को कम महत्व दिया जाता था, लीला ने बीए की डिग्री प्राप्त की और हिंदी सिनेमा की पहली पढ़ी-लिखी अभिनेत्रियों में से एक मानी गईं।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत रंगमंच से की, जहां वह मराठी नाट्य समूह 'नाट्यमन्वंतर' से जुड़ीं और कई नाटकों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं। उनका अभिनय का जुनून उन्हें फिल्मों की दुनिया में ले गया।
लीला की निजी जिंदगी में भी कई संघर्ष थे। कम उम्र में उनकी शादी डॉ. गजानन यशवंत चिटनिस से हुई, और वह चार बच्चों की मां बनीं। हालांकि, उनका वैवाहिक जीवन ज्यादा समय तक नहीं चला। पति से अलग होने के बाद, बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह से लीला पर आ गई। परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्होंने स्कूल में अध्यापिका की नौकरी की और रंगमंच से भी जुड़ी रहीं।
फिल्मों में उनका सफर आसान नहीं था। उन्होंने छोटे किरदारों और एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में काम करना शुरू किया। 1937 में आई फिल्म 'जेंटलमैन डाकू' ने उनके करियर को नई दिशा दी, जिसमें उन्होंने पुरुषों के कपड़े पहनकर एक अनोखा किरदार निभाया।
इसके बाद, लीला चिटनिस की प्रतिभा पर फिल्म इंडस्ट्री की नजर पड़ी और उन्हें बॉम्बे टॉकीज से जुड़ने का मौका मिला। 1939 में आई फिल्म 'कंगन' ने उन्हें बड़ा स्टार बना दिया। इस फिल्म में उन्होंने अशोक कुमार के साथ मुख्य भूमिका निभाई, और उनकी जोड़ी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गई।
'कंगन' के बाद, लीला ने अशोक कुमार के साथ 'बंधन', 'आजाद' और 'झूला' जैसी कई सफल फिल्मों में काम किया। अशोक कुमार ने कहा था कि बिना बोले भाव व्यक्त करने की कला उन्होंने लीला चिटनिस से सीखी।
अपने करियर के सुनहरे दौर में, लीला ने 1941 में लक्स साबुन के विज्ञापन में नजर आकर एक नया इतिहास रचा। उस समय इस तरह के विज्ञापनों में केवल हॉलीवुड की बड़ी अभिनेत्रियां ही दिखाई देती थीं।
समय के साथ नई अभिनेत्रियों का आगमन हुआ और लीला ने अपने करियर की दिशा बदल ली। 1948 में आई फिल्म 'शहीद' में उन्होंने मां का किरदार निभाया, जिसने उनकी पहचान हमेशा के लिए बदल दी। इसके बाद वह हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार मांओं में से एक बन गईं।
लीला चिटनिस ने दिलीप कुमार, राज कपूर जैसे बड़े सितारों की मां की भूमिका निभाई। 'आवारा', 'गंगा जमुना' और 'गाइड' जैसी फिल्मों में उनके निभाए गए मां के किरदारों को खूब सराहा गया। उन्होंने पर्दे पर त्याग और ममता की ऐसी छवि बनाई, जिसे बाद की कई अभिनेत्रियों ने आगे बढ़ाया।
1985 में आई फिल्म 'दिल तुझको दिया' उनकी आखिरी फिल्म थी। इसके बाद वह अमेरिका चली गईं और अपने बच्चों के साथ रहने लगीं। 14 जुलाई 2003 को 94 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।