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ममूटी: मलयालम सिनेमा का मेगास्टार, जिसने वकालत से शुरू किया अपना सफर

ममूटी, जो मलयालम सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक हैं, ने अपने करियर की शुरुआत वकालत से की थी। 7 सितंबर 1951 को जन्मे ममूटी ने 1971 में बाल कलाकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे मुख्य भूमिकाओं में पहचान बनाई। उन्होंने 400 से अधिक फिल्मों में काम किया है और विभिन्न भाषाओं में भी अभिनय किया है। ममूटी को कई पुरस्कारों से नवाजा गया है, जिसमें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 1998 में पद्म श्री शामिल हैं। आज भी, वह नए और चुनौतीपूर्ण किरदारों के लिए तैयार हैं।
 

ममूटी का अद्वितीय सफर

मुंबई, 6 सितंबर। मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में जब बड़े नामों की चर्चा होती है, तो ममूटी का नाम सबसे पहले आता है। अपने पांच दशकों के करियर में उन्होंने सैकड़ों फिल्मों और विविध किरदारों के माध्यम से एक अलग पहचान बनाई है। ममूटी का फिल्मी सफर सीधे तौर पर शुरू नहीं हुआ; पहले वह वकील थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें अभिनय की दुनिया में ला खड़ा किया, जिससे वह धीरे-धीरे मलयालम सिनेमा के मेगास्टार बन गए।


ममूटी का जन्म मुहम्मद कुट्टी पनापरम्बिल इस्माइल के नाम से 7 सितंबर 1951 को हुआ। केरल में पले-बढ़े ममूटी ने अपनी शिक्षा के बाद एर्नाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने केरल की अदालतों में वकालत की, लेकिन उनका अभिनय का सपना हमेशा उनके साथ रहा। पढ़ाई के दौरान ही उन्हें बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में काम करने का अवसर मिला।


1971 में ममूटी ने फिल्म 'अनुभवंगल पालिचाकल' में बाल कलाकार के रूप में अपनी पहली बार कैमरे के सामने अभिनय किया। हालांकि उनकी भूमिका छोटी थी, लेकिन इससे उनके फिल्मी करियर की शुरुआत हुई। इसके बाद उन्हें कुछ छोटे-छोटे मौके मिले और 1980 में 'विल्क्कनुंडु स्वप्नंगल' से उन्हें पहचान मिली।


1980 का दशक ममूटी के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। 'अहिंसा', 'संध्याक्कु विरिंजा पूवु', 'अथिरात्रम', 'यात्रा', 'निराकूट्टू' और 'न्यू दिल्ली' जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच एक मजबूत पहचान दिलाई।


समय के साथ, ममूटी ने मलयालम सिनेमा में अपनी जगह इतनी मजबूत कर ली कि वह इंडस्ट्री के प्रमुख सितारों में गिने जाने लगे। 'ओरु वडक्कन वीरगाथा', 'मथिलुकल', 'विदेयन', 'पोंथन माडा' और 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय की आलोचकों ने भी सराहना की। 'डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर' में उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर का किरदार निभाया, जो उनके करियर के सबसे यादगार प्रदर्शनों में से एक रहा।


ममूटी ने केवल मलयालम फिल्मों तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने तमिल, तेलुगु, हिंदी, कन्नड़ और अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया। विभिन्न भाषाओं और किरदारों में खुद को ढालने की उनकी क्षमता ने उन्हें क्षेत्रीय सीमाओं से परे पहुंचाया। उन्होंने अपने करियर में 400 से अधिक फिल्मों में काम किया और आज भी नए विषयों और अनोखी कहानियों को चुनने में पीछे नहीं हटते।


ममूटी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके अलावा, उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कारों और फिल्मफेयर दक्षिण पुरस्कारों से भी कई बार सम्मानित किया गया है। सिनेमा में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1998 में पद्म श्री से नवाजा।


70 की उम्र पार करने के बावजूद, ममूटी का काम करने का जुनून कम नहीं हुआ है। वह आज भी नई फिल्मों और चुनौतीपूर्ण किरदारों का हिस्सा बन रहे हैं।