मणिपुर की अनकही दास्तान: फिल्म 'बूंग' की मासूमियत और साहस
फिल्म 'बूंग' मणिपुर की अनकही कहानियों को एक 9 वर्षीय बच्चे के नजरिए से प्रस्तुत करती है। यह फिल्म न केवल एक बच्चे की साहसिक यात्रा है, बल्कि मणिपुर की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को भी छूती है। निर्देशक लक्ष्मीप्रिया देवी ने इस फिल्म के माध्यम से मासूमियत और रिश्तों के नए अर्थों को उजागर किया है। जानें कैसे एक बच्चे की जिद और विश्वास ने इस कहानी को अद्वितीय बना दिया है।
Mar 7, 2026, 16:16 IST
मणिपुर की गहरी कहानियों का पर्दाफाश
जब भी मणिपुर का नाम लिया जाता है, तो अक्सर राजनीतिक हलचल और समाचारों की बातें सामने आती हैं। लेकिन सिनेमा की जादुई दुनिया हमें उस क्षेत्र की मानवीय कहानियों से भी परिचित कराती है, जो अक्सर खबरों में छिप जाती हैं। बाफ्टा पुरस्कार विजेता फिल्म 'बूंग' इसी तरह की एक अनमोल कृति है। नवोदित निर्देशक लक्ष्मीप्रिया देवी की यह फिल्म एक 9 वर्षीय बच्चे के नजरिए से मणिपुर की अनकही कहानी को प्रस्तुत करती है। यह फिल्म यह दर्शाती है कि कभी-कभी सबसे कठिन सच्चाइयाँ एक बच्चे की जिद में छिपी होती हैं।
एक बच्चे की साहसिक यात्रा
कहानी 9 साल के ब्रोजेंद्र सिंह, जिसे 'बूंग' (गुगुन किपजेन) कहा जाता है, के इर्द-गिर्द घूमती है। यह कहानी उसके लापता पिता की खोज पर आधारित है। म्यांमार सीमा के निकट स्थित एक छोटे से गाँव में रहने वाला बूंग यह मानने को तैयार नहीं है कि उसके पिता उसे छोड़कर चले गए हैं। जबकि बड़े लोग वास्तविकता को स्वीकार कर चुके हैं, बूंग का मासूम दिल एक ऐसी खोज पर निकलता है जो उसे न केवल सीमा पार ले जाती है, बल्कि रिश्तों के नए अर्थ भी सिखाती है।
सादगी में छिपी गहराई
'बूंग' की खासियत इसकी सादगी है। फिल्म में न तो कोई भव्य दृश्य है और न ही भारी बैकग्राउंड स्कोर, जो दर्शकों को रोने के लिए मजबूर करे। इसके बजाय, यह फिल्म रोजमर्रा के छोटे-छोटे क्षणों के माध्यम से दर्शकों के दिल में उतर जाती है। एक शरारती बच्चा, उसकी चिंतित माँ और एक वास्तविकता के करीब दोस्ती ही इस फिल्म की आत्मा है।
माँ-बेटे का अटूट विश्वास
बूंग के पिता के लापता होने को कई साल हो चुके हैं। फोन कॉल और वॉयस मैसेज का कोई जवाब नहीं आता, फिर भी बूंग को विश्वास है कि वे जीवित हैं। वह अपनी माँ, मंदाकिनी (बाला हिजाम) को उनके लौटने का 'उपहार' देना चाहता है। पूरा गाँव पिता की मृत्यु को स्वीकार कर चुका है, लेकिन मंदाकिनी का इनकार बूंग के संकल्प को और मजबूत करता है। अपने सबसे अच्छे दोस्त राजू (अंगोम सनमतम) के साथ, बूंग मोरे जैसे सीमावर्ती शहर की जटिलताओं को पार करते हुए म्यांमार पहुँच जाता है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और मासूमियत का टकराव
यह फिल्म एक बच्चे के साहसिक कार्य की कहानी लगती है, लेकिन इसके भीतर मणिपुर की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति की गहराई भी छिपी है। सीमाएँ, पहचान और अपनेपन का मुद्दा यहाँ शोर मचाकर नहीं, बल्कि अनुभव के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। निर्देशक लक्ष्मीप्रिया देवी ने एक बच्चे की नजर से जातीय तनाव और अलगाववादी संघर्षों को दैनिक जीवन का हिस्सा दिखाया है।
हल्के-फुल्के पल और सामाजिक कटाक्ष
फिल्म में बूंग की शरारतें दर्शकों को हंसाने में सफल होती हैं। स्कूल का नाम 'होमो बॉयज स्कूल' रखना, सुबह की प्रार्थना में मडोना का गाना गाना, या किसी बुली को 'सेकंड हैंड विदेशी' कहना—ये सब उसकी बढ़ती समझ और परिवेश को दर्शाते हैं। फिल्म बिना उपदेश दिए पितृसत्ता और पूर्वाग्रहों पर चुपचाप प्रहार करती है।
दोस्ती और अभिनय का जादू
फिल्म की कहानी बूंग और राजू की दोस्ती पर आधारित है। दोनों बच्चे किसी न किसी नुकसान का सामना कर रहे हैं—बूंग के पास पिता नहीं है, जबकि राजू ने अपनी माँ को खो दिया है। गुगुन किपजेन ने 'बूंग' के किरदार में मासूमियत और चंचलता का बेहतरीन मिश्रण पेश किया है। वहीं, बाला हिजाम ने एक माँ के रूप में मौन लेकिन प्रभावशाली अभिनय किया है। उनकी आँखों में छिपी त्रासदी फिल्म को गंभीरता प्रदान करती है।
निष्कर्ष: एक छोटी लेकिन शक्तिशाली आवाज
जब मुख्यधारा का सिनेमा भव्यता को प्राथमिकता देता है, 'बूंग' यह याद दिलाती है कि सबसे शक्तिशाली कहानियाँ अक्सर सबसे छोटी आवाजों से आती हैं। यह फिल्म एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो विश्वास करना नहीं छोड़ता। जब फिल्म समाप्त होती है, तो आप उस छोटे से लड़के के लिए दुआ करते हुए पाते हैं।