☰
×

नाना पाटेकर: हिंदी सिनेमा के दिग्गज का अलविदा, यादों में जिंदा रहेंगे उनके किरदार

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर को निधन हो गया। उनके अद्वितीय अभिनय और यादगार किरदारों ने उन्हें सिनेमा के इतिहास में अमर बना दिया। जानें उनके जीवन, करियर और उन फिल्मों के बारे में जिन्होंने उन्हें एक आइकन बनाया। उनके योगदान को याद करते हुए, बॉलीवुड में शोक की लहर दौड़ गई है।
 

नाना पाटेकर का निधन




मुंबई, 8 अक्टूबर। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर ने बॉलीवुड में शोक की लहर दौड़ा दी है। उनके प्रशंसक और साथी कलाकार उनकी यादों को साझा कर रहे हैं। नाना पाटेकर की अदाकारी का हर कोई दीवाना था, और उनके संवाद बोलने का तरीका अद्वितीय था। उन्होंने अपने अभिनय से हर किरदार को अमर बना दिया।


नाना पाटेकर न केवल एक अभिनेता थे, बल्कि एक लेखक, निर्माता और निर्देशक भी थे। उन्होंने 'द कन्फेशन', 'जर्नी', 'कुकू की कुंडली', 'ईथा' और 'शक्ति शालिनी' जैसी फिल्मों में बेहतरीन प्रदर्शन किया। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को मुंबई में हुआ था। फिल्म 'अग्निसाक्षी' में उन्होंने 'विश्वनाथ' नामक एक मानसिक रूप से विक्षिप्त और हिंसक पति का किरदार निभाया, जिसे दर्शकों ने बहुत सराहा। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।


नाना पाटेकर ने 1978 में ड्रामा फिल्म 'गमन' से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने मराठी फिल्मों में भी काम किया। 1989 में 'परिंदा' फिल्म से उन्होंने हिंदी सिनेमा में वापसी की, जिसमें उन्होंने एक गैंगस्टर का नकारात्मक किरदार निभाया। 1994 में उन्होंने 'प्रहार: द फाइनल अटैक' फिल्म से निर्देशन में कदम रखा।


अभिनेता नाना पाटेकर को कई फिल्मों में उनके अद्वितीय अभिनय के लिए सराहना मिली। 1990 में आई 'राजू बन गया जेंटलमैन' में उन्होंने 'जय' नामक दार्शनिक की भूमिका निभाई, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए नामांकित किया गया।


1992 में आई फिल्म 'अंगार' में उन्हें सर्वश्रेष्ठ खलनायक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इस फिल्म में उन्होंने 'माजिद खान' नामक एक खतरनाक व्यक्ति का किरदार निभाया। 1993 में 'तिरंगा' में नाना पाटेकर ने पुलिस इंस्पेक्टर 'शिवाजीराव वाघले' की भूमिका निभाई, जिसे आज भी प्रशंसा मिलती है।


1994 में 'क्रांतिवीर' फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इस फिल्म में उन्होंने 'प्रताप नारायण तिलक' का किरदार निभाया, जो उनके अभिनय का एक अनूठा उदाहरण था। उनके बोलने का अंदाज आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है।


2005 में 'अपहरण' में नाना पाटेकर ने 'तबरेज आलम' नामक एक प्रभावशाली राजनेता का नकारात्मक किरदार निभाया, जिसके लिए उन्हें बेस्ट निगेटिव रोल का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 2017 में 'नटसम्राट' में उनके शानदार अभिनय के लिए उन्हें मराठी फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।


नाना पाटेकर ने 'अग्निसाक्षी', 'खामोशी: द म्यूजिकल', 'शक्ति: द पावर', 'वेलकम' और 'राजनीति' जैसी फिल्मों में सफलता हासिल की। उन्होंने हर प्रकार के किरदार में खुद को ढाला, जिससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता था कि वे अभिनय कर रहे हैं या वास्तविकता में ऐसा हो रहा है। बच्चों की फिल्म 'अभय' में उन्होंने भूत का किरदार निभाया। उनका करियर शानदार रहा और उन्होंने बॉलीवुड में कदम रखने के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्हें कला के प्रति उनके समर्पण के लिए पद्म श्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।