गौहर जान: भारत की पहली रिकॉर्डिंग स्टार की अनकही कहानी
गौहर जान का अद्वितीय सफर
मुंबई, 25 जून। भारतीय संगीत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने अपनी कला से एक नया अध्याय लिखा। गौहर जान का नाम भी इन्हीं में शामिल है। उन्हें भारत की पहली रिकॉर्डिंग स्टार और सेलिब्रिटी गायिका के रूप में जाना जाता है। उनकी पहचान केवल गायकी तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी शाही जीवनशैली और बेबाकी के किस्से भी काफी चर्चित रहे। एक दिलचस्प किस्सा यह है कि उन्होंने एक कार्यक्रम में अपनी पूरी टीम के साथ जाने के लिए स्पेशल ट्रेन की मांग की थी।
गौहर जान का जन्म 26 जून 1873 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ। उनका असली नाम एंजेलिना योवर्ड था। उनके पिता रॉबर्ट विलियम योवर्ड एक इंजीनियर थे, जबकि मां विक्टोरिया हेमिंग्स संगीत और नृत्य में पारंगत थीं। जब गौहर छोटी थीं, तब उनके माता-पिता का तलाक हो गया। इसके बाद उनकी मां ने इस्लाम धर्म अपनाया और अपना नाम मलका जान रखा। एंजेलिना का नाम भी बदलकर गौहर जान रखा गया। बाद में मां-बेटी कोलकाता चली गईं, जहां से गौहर के संगीत करियर की शुरुआत हुई।
कोलकाता में गौहर जान ने उस समय के कई प्रमुख उस्तादों से संगीत और नृत्य की शिक्षा ली। उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, ठुमरी, दादरा, कजरी और कथक जैसी विधाओं में महारत हासिल की। उनकी प्रतिभा कम उम्र में ही लोगों के सामने आने लगी। 1888 में उन्होंने दरभंगा राज के दरबार में प्रस्तुति दी, जिसके बाद उन्हें दरबारी संगीतकार के रूप में पहचान मिली। धीरे-धीरे उनका नाम देश के कई राजघरानों में फैलने लगा।
बीसवीं सदी की शुरुआत में जब ग्रामोफोन तकनीक भारत में आई, तब गौहर जान ने एक नया इतिहास रचा। 1902 में उनकी आवाज पहली बार रिकॉर्ड की गई। उस समय रिकॉर्ड की अवधि केवल तीन मिनट होती थी, इसलिए उन्होंने लंबे शास्त्रीय गायन को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने की अनोखी कला विकसित की। हर रिकॉर्डिंग के अंत में वे 'माय नेम इज गौहर जान' कहती थीं, जो उनकी पहचान बन गई। 1902 से 1920 के बीच उन्होंने 600 से अधिक गीत रिकॉर्ड किए और दस से ज्यादा भाषाओं में गाया।
गौहर जान की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि उनकी फीस उस समय के हिसाब से बहुत ज्यादा मानी जाती थी। उनकी शाही जीवनशैली के कई किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। इनमें से एक प्रसिद्ध किस्सा स्पेशल ट्रेन की मांग से जुड़ा है। इतिहासकार विक्रम संपत की किताब 'माई नेम इज गौहर जान' में उल्लेख है कि एक रियासती कार्यक्रम में जाने के लिए उन्होंने अपने बड़े दल, नौकरों और सामान के साथ यात्रा करने के लिए स्पेशल ट्रेन की मांग की थी। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए यह मांग स्वीकार कर ली गई। इससे उस समय गौहर जान के प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है।
गौहर जान की तस्वीरें उस समय पोस्टकार्डों पर छपती थीं और लोग उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते थे। दिसंबर 1911 में उन्हें दिल्ली दरबार में ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम के सम्मान में आयोजित समारोह में प्रस्तुति देने के लिए भी बुलाया गया था। यह उस समय किसी कलाकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।
जीवन के अंतिम वर्षों में गौहर जान मैसूर चली गईं। मैसूर के महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने उन्हें दरबारी संगीतकार के रूप में आमंत्रित किया था। लेकिन बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य में गिरावट के कारण उनका जीवन धीरे-धीरे कठिन होता गया। 17 जनवरी 1930 को मैसूर में उनका निधन हो गया।