×

क्या है सुबोध भावे का अनुभव 'श्री बाबा नीब करोरी महाराज' में? जानें उनके अलौकिक सफर के बारे में!

अभिनेता सुबोध भावे जल्द ही 'श्री बाबा नीब करोरी महाराज' फिल्म में नीम करौली बाबा का किरदार निभाते नजर आएंगे। उन्होंने अपने पहले शूटिंग दिन के आध्यात्मिक अनुभव और इस यात्रा में मिली सकारात्मक ऊर्जा के बारे में बात की। सुबोध का मानना है कि इस किरदार को निभाना उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। जानें उनके अनुभव और बाबा के प्रति उनकी श्रद्धा के बारे में।
 

सुबोध भावे का दिव्य किरदार


मुंबई, 28 मई। अभिनेता सुबोध भावे जल्द ही 'श्री बाबा नीब करोरी महाराज' फिल्म में नीम करौली बाबा का किरदार निभाते नजर आएंगे। उनका मानना है कि इस अद्भुत भूमिका को निभाना उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो बाबा की इच्छा के बिना संभव नहीं था।


सुबोध ने एक विशेष बातचीत में अपने पहले शूटिंग दिन के आध्यात्मिक अनुभव और इस यात्रा में मिली सकारात्मक ऊर्जा के बारे में बताया।


उन्होंने कहा, "मुझे खुशी है कि यह फिल्म आखिरकार रिलीज हो रही है, क्योंकि लोग इसका लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। भारत और विदेशों से लाखों भक्त हर साल बाबा के कैंची धाम आश्रम आते हैं। उनके प्रति लोगों की आस्था अटूट है। हमारे निर्माताओं और निर्देशक ने उनके जीवन पर फिल्म बनाने का जो निर्णय लिया, वह सराहनीय है। मुझे गर्व है कि मुझे महाराज जी का किरदार निभाने का मौका मिला।"


सुबोध ने आगे कहा, "किसी संत का किरदार निभाना चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि लोग उन्हें श्रद्धा और भक्ति से देखते हैं। संतों के प्रति लोगों के दिलों में एक विशेष स्थान होता है। ऐसे महात्मा का किरदार निभाना आसान नहीं है, जब तक कि आपको उनका आशीर्वाद न मिले। मुझे विश्वास है कि मैं इस भूमिका को निभा सका, क्योंकि महाराज जी की कृपा मुझ पर बनी रही।"


अपनी यात्रा की शुरुआत को याद करते हुए, सुबोध ने बताया कि जब फिल्म के निर्देशक शरद सिंह ठाकुर ने उन्हें इस प्रोजेक्ट के बारे में बताया, तो वह बाबा के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे। उन्होंने कहा, "मैंने कुछ दोस्तों से उनका नाम सुना था, जो अक्सर कैंची धाम जाते थे, लेकिन मैं खुद कभी नहीं गया। जब शरद जी ने मुझे उनकी कहानी सुनाई, तो मैंने उनके साथ गहरा जुड़ाव महसूस किया। मुझे यह भी आश्चर्य हुआ कि शरद जी मुझ तक कैसे पहुंचे, क्योंकि न तो वह और न ही उनकी टीम मुझे व्यक्तिगत रूप से जानते थे। मुझे एहसास हुआ कि कोई भी अभिनेता संत का किरदार खुद नहीं चुनता; संत खुद अपने अभिनेता को चुनते हैं। मुझे सच में विश्वास है कि महाराज जी ने मुझे इस किरदार के लिए चुना।"


सुबोध ने अपने पहले शूटिंग दिन का अनुभव साझा करते हुए कहा, "मेरी शूटिंग प्रयागराज में थी, उसी घर में जहां महाराज जी रुका करते थे। वह घर उनके एक शिष्य का था और बाबा के निर्देश पर बनवाया गया था। जिस कमरे में वह सोते थे, उसे वैसा ही सहेजकर रखा गया है। वहां उनकी तस्वीर, बिस्तर और पूजा-अर्चना की परंपरा आज भी निभाई जाती है।"


उन्होंने आगे बताया, "जब मैं पहली बार वहां गया, तो मैंने उनके सामने प्रणाम किया। वहां कई बुजुर्ग भक्त थे, जिन्होंने बाबा को देखा था। उन्होंने मुझे बैठाया और मेरे ऊपर वही कंबल ओढ़ा दिया, जिसे महाराज जी इस्तेमाल करते थे। किसी ने चंदन का लेप लगाया, किसी ने माथे पर तिलक किया और दूसरों ने फूल चढ़ाए। उस पल मुझे ऐसा लगा कि महाराज जी स्वयं मेरे सामने हैं।"


सुबोध ने उस अनुभव को अपने जीवन का सबसे अलौकिक बताते हुए कहा, "वह अनुभव असाधारण था। उस समय मुझे महसूस हुआ कि मेरे भीतर एक शक्तिशाली, सकारात्मक और पवित्र ऊर्जा प्रवेश कर रही है। यह ऊर्जा निस्वार्थ प्रेम और करुणा से भरी हुई थी। मेरा मानना है कि शूटिंग का वह पहला दिन हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण था, क्योंकि वहीं हमें बाबा की स्वीकृति और आशीर्वाद मिला। यही कारण था कि आगे की फिल्म की यात्रा हमारे लिए सरल हो गई।"