क्या है मनोज बाजपेयी की नई फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' की कहानी? जानें उनके किरदार की गहराई!
मनोज बाजपेयी की नई फिल्म पर चर्चा
मुंबई, 23 सितंबर। नेशनल अवॉर्ड विजेता अभिनेता मनोज बाजपेयी इन दिनों अपनी हालिया फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' को लेकर सुर्खियों में हैं। इस फिल्म में उनके निभाए गए किरदार को दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है।
एक इंटरव्यू में मनोज ने बताया कि उनका किरदार परिवार में हमेशा 'अच्छा इंसान' और 'बड़ा इंसान' बने रहने की चाह में इतना आगे बढ़ जाता है कि वह अपने परिवार की आवश्यकताओं को अनदेखा कर देता है।
मनोज बाजपेयी इस फिल्म में एक रिटायर्ड स्कूल शिक्षक और विधुर का रोल निभा रहे हैं, जो अपने जीवन में खुद को हमेशा परिवार का सही और जिम्मेदार सदस्य मानता है। उसे लगता है कि उसने अपने परिवार के लिए बहुत कुछ किया है और जरूरत पड़ने पर हमेशा अपने भाइयों का सहारा बना रहा है। लेकिन, जब उसका बेटा उसे उसकी सोच का दूसरा पहलू दिखाता है, तो उसकी सोच में बदलाव आने लगता है।
मनोज ने कहा, ''मेरा किरदार हर चीज को सही और गलत के नजरिए से देखने का आदी है। उसके लिए किसी भी परिस्थिति को बीच के रास्ते से देखने की गुंजाइश कम है। अगर मेरे किरदार की बैकस्टोरी को समझा जाए तो उसके बारे में कई बातें उसके बेटे के जरिए सामने आती हैं। वह परिवार में हमेशा खुद को अच्छा और दूसरों से बड़ा साबित करने की कोशिश करता रहा है। उसे लगता है कि उसने अपने भाइयों के लिए बहुत कुछ किया है। उनकी मदद करके वह परिवार में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहा है। यही सोच धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है।''
उन्होंने आगे कहा, ''अपने परिवार के लिए कुछ करने और खुद को परिवार का 'बड़ा इंसान' समझने की इस कोशिश में वह अपने सबसे करीबी परिवार को ही कहीं पीछे छोड़ देता है। उसे हमेशा लगता है कि उसने अपने भाइयों के लिए इतना कुछ किया है, इसलिए उसके फैसलों और त्याग की कद्र होनी चाहिए। लेकिन जब उसका बेटा उसके सामने यह बात रखता है कि उसकी इस सोच और व्यवहार का असर उसके अपने परिवार पर भी पड़ा है, तो उसके अंदर की पूरी तस्वीर हिल जाती है।''
मनोज ने कहा, ''उस वक्त मेरे किरदार को एहसास होता है कि जिस काम को वह इतने समय से अपनी सबसे बड़ी अच्छाई मानता आया था, वही उसके आसपास के लोगों के लिए परेशानी की वजह भी बन रहा था। कई बार हम अपनी ही अच्छाई या महानता के इतने आदी हो जाते हैं कि यह देखना बंद कर देते हैं कि हमारी वही 'महानता' दूसरों के लिए किस तरह मुश्किलें पैदा कर रही है।''
उन्होंने कहा, ''इंसान अक्सर अपने किए हुए कामों को एक खास नजरिए से देखता है और खुद को सही साबित करने की कोशिश करता रहता है। असल चुनौती खुद को समझने की होती है। मेरे किरदार के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है, जहां उसे अपनी सोच और अपने फैसलों को एक अलग नजरिए से देखने का मौका मिलता है।''
'लास्ट मैन इन टावर' अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। फिल्म की कहानी तेजी से बदलती मुंबई की पृष्ठभूमि में सेट है। इसमें मनोज के किरदार की जिंदगी तब बदल जाती है, जब एक बड़ा बिल्डर उस पुरानी इमारत के सभी निवासियों को अच्छी रकम देकर घर खाली करने का प्रस्ताव देता है। ज्यादातर लोग इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं, क्योंकि इसके बदले उन्हें बड़ी रकम मिल रही होती है।
हालांकि, मनोज का किरदार अपने घर को छोड़ने से साफ इनकार कर देता है। इसके बाद वह पूरी बिल्डिंग को खाली कराने और वहां लग्जरी टावर बनाने की योजना के बीच एक बड़ी रुकावट बन जाता है। कहानी केवल घर बचाने की लड़ाई तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसके जरिए परिवार, रिश्तों, पैसे, सोच और इंसान के अपने बारे में बनाए नजरिए को भी दर्शाया गया है.