क्या है इम्तियाज़ अली की नई फिल्म *मैं वापस आऊंगा* की खासियत? जानें एक अनकही प्रेम कहानी के बारे में!
एक अनकही प्रेम कहानी का जादू
जब किसी कहानी की भावनाएँ आपके दिल को गहराई से छूती हैं, तो उससे बचना मुश्किल हो जाता है। जब कोई आपकी भावनाओं की गहराई की परवाह नहीं करता, और आपके दिल के किसी कोने से अनकही भावनाएँ उभरने लगती हैं, तब आपको एहसास होता है कि आपने एक सच में खूबसूरत प्रेम कहानी पाई है। इम्तियाज़ अली की *मैं वापस आऊंगा* ऐसी ही एक प्रेम कहानी है।
सरहद से बँटी प्रेम कहानी
इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने एक बुजुर्ग सरदार का किरदार निभाया है, जो बंटवारे के समय पंजाब आ गए थे। सरगोधा, जो 1947 में पाकिस्तान का हिस्सा बना, में छूटे अपने घर की यादें उनके दिल में एक दर्दनाक काँटे की तरह चुभती रहती हैं। जैसे-जैसे उनकी सेहत बिगड़ती है, सरदार को अपने पहले प्यार की याद आने लगती है। उनका उपनाम 'कियानू' था। युवा कियानू (वेदांग रैना) को कॉलेज की छात्रा ज़िया (शर्वरी) से प्यार हो जाता है। अब, जब सरदार मौत के करीब हैं, तो प्यार की यादों में खोए होने के कारण वे अपनी अंतिम साँस नहीं ले पा रहे हैं।
नवीनतम पीढ़ी की उलझन
सरदार का पोता, निर्वैर (दिलजीत दोसांझ), एक युवा है जो अपनी प्रेमिका (बनिता संधू) के साथ रिश्ते को लेकर हिचकिचा रहा है। विदेश में एक अच्छी नौकरी होने के बावजूद, वह अपने जीवन में सच्चे जुनून की कमी से पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए स्टैंड-अप कॉमेडी करने लगता है। जब उसे अपने दादाजी की तबियत की खबर मिलती है, तो वह घर लौटता है और कहानी में हमारी आँखों और कानों का काम करता है।
दुखद प्रेम कहानियों का जाल
सरदार अजीब बातें करने लगे हैं, जैसे कि चाँद पर कोई मैच खेला जा रहा है। जैसे-जैसे निर्वैर अपने दादाजी की बातों को समझने लगता है, उसे एहसास होता है कि ये सभी गहरे प्रतीक हैं। उसे पता चलता है कि उसके दादाजी एक अधूरे काम की वजह से ज़िंदगी से जुड़े हुए हैं – एक ऐसा सफ़र जिसे पूरा करने के लिए वे सरगोधा जाना चाहते हैं। यह काम कियानू और ज़िया की प्रेम कहानी से जुड़ा है; बंटवारे ने उनकी प्रेम कहानी को त्रासदी में बदल दिया था।
एक नहीं, दो प्रेम कहानियाँ
इम्तियाज़ अली की इस फ़िल्म में एक नहीं, बल्कि दो प्रेम कहानियाँ हैं: कियानू और जिया के रोमांस के साथ-साथ सरदारजी और सरगोधा की प्रेम कहानी भी है। दोनों कहानियों को जोड़ने वाली त्रासदी एक ही है – बंटवारा।
बंटवारे की गहराई
जब कियानू प्यार के जुनून में डूबा था, तब उसके आस-पास की दुनिया बंटवारे की नफ़रत में डूबी हुई थी। *मैं वापस आऊंगा* बंटवारे के उस पहलू को दिखाती है जिसे पंजाबियों की एक पूरी पीढ़ी ने खुद झेला था। इम्तियाज़ की फ़िल्म बंटवारे को राजनीतिक और धार्मिक नज़रिए से नहीं दिखाती। यहाँ कोई ठोस विलेन नहीं है; *मैं वापस आऊंगा* का विलेन खुद बंटवारा है।
एक अद्भुत अनुभव
इम्तियाज़ अली और नयनिका महतानी ने बंटवारे के दर्द को प्रेम कहानी में पिरोया है। लेखन में कहानी और घटनाक्रम पर ज़बरदस्त पकड़ है। बंटवारे पर बनी कहानियों में नफ़रत का आ जाना या प्रेम कहानी में किसी को विलेन के तौर पर दिखाना बहुत आसान होता है। लेकिन *मैं वापस आऊंगा* एक मुश्किल रास्ता चुनती है।
एक्टिंग की मास्टरक्लास
नसीरुद्दीन शाह को *सरदारजी* के रूप में देखना एक्टिंग की मास्टरक्लास में शामिल होने जैसा है। 95 साल के बुजुर्ग का किरदार निभाते हुए, उन्होंने अपने चेहरे को एक कैनवास बना लिया। अगर उन्हें *मैं वापस आऊंगा* के लिए नेशनल अवॉर्ड नहीं मिलता है, तो ऐसा लगेगा कि दुनिया में कुछ बुनियादी गड़बड़ है।
इम्तियाज़ की बेहतरीन फ़िल्म
जैसे-जैसे 'मैं वापस आऊंगा' आगे बढ़ी, दर्शक अपनी आलोचनात्मक सोच को इम्तियाज़ के हवाले कर दिया। फ़िल्म खत्म होने तक लोग खुलकर रो रहे थे। यह बात इसलिए भी खास है क्योंकि आज की मीडिया स्क्रीनिंग में अक्सर कंटेंट क्रिएटर्स और यूट्यूबर्स का बोलबाला होता है। लेकिन *मैं वापस आऊंगा* उन लोगों के दिलों को छूती है जिनकी जड़ें अब सरहद के उस पार हैं।