क्या दर्शकों ने सिनेमा को छोड़ दिया है? संजय गुप्ता का नया बयान चर्चा में!
संजय गुप्ता का बयान
मुंबई, 7 जून। एक समय था जब नई फिल्मों के रिलीज होते ही सिनेमाघरों के बाहर लंबी कतारें लगती थीं, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। अक्सर यह सवाल उठता है कि दर्शक सिनेमाघरों से दूर क्यों होते जा रहे हैं। क्या इसका कारण मोबाइल फोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं, या कुछ और? इसी संदर्भ में फिल्म निर्देशक संजय गुप्ता ने एक बयान दिया है, जिसने नई बहस को जन्म दिया है।
संजय गुप्ता का मानना है कि दर्शकों ने सिनेमा को नहीं छोड़ा है, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री ने उन्हें निराश किया है।
उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ''फिल्मों की वर्तमान स्थिति के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म को दोष देना उचित नहीं है। लोग मानते हैं कि ऑनलाइन वीडियो प्लेटफॉर्म और वेब सीरीज ने सिनेमाघरों का महत्व कम कर दिया है, लेकिन असली समस्या कहीं और है। जब दर्शकों को अच्छी कहानी, नया कंटेंट और बेहतरीन अभिनय नहीं मिलता, तो वे सिनेमाघरों की ओर आकर्षित नहीं होते।''
संजय ने आगे कहा, ''सिनेमाघरों में खाने-पीने की चीजें इतनी महंगी हो गई हैं कि एक सामान्य परिवार के लिए फिल्म देखना एक बड़ा खर्च बन गया है। एक बड़े डिब्बे वाले पॉपकॉर्न की कीमत लगभग 700 रुपए और एक कोल्ड ड्रिंक की कीमत करीब 450 रुपए तक पहुंच गई है। इस तरह, परिवार के साथ फिल्म देखने जाना पहले की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा हो गया है।''
उन्होंने लिखा, ''फिल्मों को खत्म करने का काम किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म ने नहीं किया है। इसके पीछे कमजोर कहानियां, बिना मेहनत की गई पटकथाएं और ऐसे सितारे हैं, जिन्होंने दर्शकों को चौंकाना और कुछ नया देना लगभग बंद कर दिया है। दर्शक आज भी मौजूद हैं और अच्छी फिल्मों का इंतजार कर रहे हैं। समस्या यह नहीं है कि लोग फिल्मों में रुचि नहीं रखते, बल्कि समस्या यह है कि उन्हें वैसा मनोरंजन नहीं मिल रहा जिसकी वे उम्मीद करते हैं।''
संजय गुप्ता के इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कई लोगों ने उनके विचारों का समर्थन किया और कहा कि फिल्म उद्योग को अपनी कमियों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। वहीं, कुछ लोगों ने अपने-अपने कारण भी बताए।
एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, ''सिर्फ महंगे खाने-पीने की चीजें ही नहीं हैं, बल्कि टिकटों की बढ़ती कीमतें भी बड़ी वजह हैं।''
एक अन्य यूजर ने कहा, "मल्टीप्लेक्स कल्चर के बढ़ने के बाद फिल्म इंडस्ट्री ने छोटे शहरों और सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों के दर्शकों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया।"