क्या जानते हैं आप? MF Hussain ने जूते क्यों छोड़ दिए थे?
भारतीय कला के दिग्गज MF Hussain का सफर
मुंबई, 17 सितंबर (वेब वार्ता)। एमएफ हुसैन भारतीय कला के क्षेत्र में एक प्रमुख चित्रकार माने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत फिल्मों के पोस्टर बनाने से की थी। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया।
मकबूल फिदा हुसैन का नाम भारतीय कला में एक विशेष स्थान रखता है, जिन्होंने अपनी अद्वितीय पेंटिंग्स के माध्यम से देश की कला को वैश्विक पहचान दिलाई। उनकी लंबाई, हाथ में ब्रश, सफेद दाढ़ी और नंगे पैर चलने की आदत उनकी पहचान बन गई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्होंने जूते पहनना क्यों छोड़ दिया था?
हुसैन का जन्म 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ, जबकि उनका बचपन इंदौर में बीता। उन्होंने बहुत कम उम्र में अपनी मां को खो दिया था। एक बातचीत में उन्होंने बताया था कि मां के निधन के समय उनकी उम्र इतनी कम थी कि उन्हें उनसे जुड़ी कोई स्पष्ट याद नहीं थी। यह कमी उनकी कला में मां और महिलाओं की छवियों के प्रति उनके दृष्टिकोण में भी झलकती है।
कला के प्रति लगाव और फिल्मी सफर
हुसैन का कला के प्रति प्रेम बचपन से ही था। 1930 के दशक में जब वह मुंबई पहुंचे, तो उन्होंने बड़े-बड़े होर्डिंग और पोस्टर पेंट करने का कार्य शुरू किया। इसी के माध्यम से उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत की। 1947 में, वह प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप से जुड़े, जिसने भारतीय कला को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करने का प्रयास किया। उनकी पेंटिंग्स में भारतीय संस्कृति, इतिहास, धार्मिक विषय और आम जीवन के रंगों का समावेश हुआ।
कवि के प्रति सम्मान और जूते उतारने की कहानी
हुसैन के नंगे पैर रहने की कहानी प्रसिद्ध हिंदी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध से जुड़ी है। मुक्तिबोध के निधन के बाद, हुसैन उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए। कवि के प्रति उनके गहरे सम्मान के कारण, हुसैन को दुख था कि मुक्तिबोध को जीवन में वह पहचान नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे। कहा जाता है कि अंतिम संस्कार से लौटते समय उन्होंने अपने जूते उतार दिए और लंबे समय तक जूते नहीं पहने। मई की गर्मी में तारकोल की सड़क पर नंगे पैर चलकर उन्होंने मुक्तिबोध के दर्द को महसूस करने की कोशिश की।
फिल्मों में भी दिखाया हुनर
हुसैन का योगदान केवल पेंटिंग तक सीमित नहीं रहा। 1967 में, उन्होंने 'थ्रू द आईज ऑफ ए पेंटर' नामक फिल्म बनाई, जिसे बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर पुरस्कार मिला। इसके अलावा, उन्होंने 'गजगामिनी' और 'मीनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीज' जैसी फिल्मों का निर्देशन भी किया। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले। उनकी घोड़ों की पेंटिंग्स भी बहुत प्रसिद्ध रहीं। कला के विवादों और धमकियों के बीच, 2006 के बाद उन्होंने भारत से बाहर रहने का निर्णय लिया। 9 जून 2011 को लंदन में 95 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।