क्या आप जानते हैं विजय आनंद की फिल्म 'गाइड' ने भारतीय सिनेमा को कैसे बदला?
विजय आनंद और 'गाइड' का जादू
मुंबई, 22 फरवरी। 1965 में एक ऐसी फिल्म आई जिसने भारतीय सिनेमा की पारंपरिक धारा को चुनौती दी। यह फिल्म थी 'गाइड', जो केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी कृति थी जिसने दर्शकों को यह दिखाया कि भारतीय सिनेमा केवल गांवों की कहानियों और भावुक मेलोड्रामा तक सीमित नहीं है। इस अद्भुत फिल्म के निर्माता विजय आनंद थे, जिन्हें फिल्म उद्योग में 'गोल्डी' के नाम से जाना जाता था।
जब उस समय की नायिकाओं को त्याग और मर्यादा का प्रतीक माना जाता था, 'गाइड' ने रोज़ी जैसे स्वतंत्र और साहसी किरदार को पेश किया। रोज़ी ने अपने दांपत्य जीवन की सीमाओं को तोड़कर अपने सपनों और नृत्य के प्रति अपने जुनून को चुना।
फिल्म का दूसरा मुख्य पात्र राजू गाइड है, जिसे देव आनंद ने जीवंत किया। राजू, एक चतुर टूरिस्ट गाइड, समय के साथ बदलता है। वह पहले एक अवसरवादी बनता है, फिर एक अपराधी और अंत में एक आध्यात्मिक संत के रूप में उभरता है, जो गांव में बारिश के लिए उपवास करता है।
यह फिल्म मानव स्वभाव के जटिल पहलुओं जैसे लालच, प्रेम, विश्वास और मोक्ष की गहरी पड़ताल करती है। 'गाइड' विजय आनंद की रचनात्मकता और साहसिकता का प्रतीक है, जो आज भी भारतीय सिनेमा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
यदि 1950 और 60 के दशक के भारतीय सिनेमा को एक कैनवास माना जाए, तो विजय आनंद ने उस पर आधुनिकता और शहरी जीवन के रंग भरे। उन्होंने 23 साल की उम्र में 'नौ दो ग्यारह' (1957) जैसी फिल्म को मात्र 40-45 दिनों में बना कर सभी को चौंका दिया।
1970 के दशक में विजय आनंद का ओशो के आध्यात्मिक प्रभाव में आना और अपनी भांजी सुषमा से विवाह करना एक ऐसा कदम था जिसने उस समय काफी विवाद खड़ा किया। परिवार और समाज के विरोध के बावजूद, गोल्डी ने अपने प्यार को प्राथमिकता दी और सुषमा के साथ एक सुखद जीवन बिताया।
जहां नायक खेतों में काम करते दिखते थे, वहीं विजय आनंद ने बॉलीवुड को एक शहरी हीरो दिया, जो 'ट्वीड जैकेट, हैट और सिगार' के साथ नजर आता था। उनके बड़े भाई देव आनंद इस शहरी आकर्षण के प्रतीक बने।
जब आप 'ज्वेल थीफ' (1967) देखते हैं, तो आपको भारत के अल्फ्रेड हिचकॉक से मिलने का अनुभव होता है। गोल्डी की अद्भुत कला दर्शकों के दिलों को छूने में सक्षम थी।
विजय आनंद की सबसे बड़ी ताकत उनकी खुद की फिल्मों का संपादन करना था। उन्होंने हमेशा केवल उतना ही शूट किया जितना आवश्यक था। उनके गाने कहानी को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।
याद करें 'तीसरी मंजिल' का 'ओ हसीना जुल्फों वाली' गाना, जिसमें आरडी बर्मन का संगीत और उनके कैमरे के एंगल एकदम सटीक थे। या 'तेरे घर के सामने' का 'दिल का भंवर करे पुकार', जिसमें रोमांस को एक अद्वितीय तरीके से प्रस्तुत किया गया।
विजय आनंद ने अपने भाई देव आनंद के विपरीत, जो एक बड़े सुपरस्टार थे, खुद को थोड़ा अंतर्मुखी रखा। उन्होंने 'कोरा कागज' और 'तेरे मेरे सपने' में संवेदनशील किरदार निभाए।
फरवरी 2004 में, 70 वर्ष की आयु में विजय आनंद को दिल का दौरा पड़ा और उन्हें मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उन्हें बाईपास सर्जरी की सलाह दी, लेकिन गोल्डी ने सर्जरी से इनकार कर दिया। 23 फरवरी 2004 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
विजय आनंद को 'गाइड' (1965) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ डायलॉग पुरस्कार मिले। इसके अलावा, 'जॉनी मेरा नाम' (1970) के लिए भी उन्हें कई पुरस्कार प्राप्त हुए।