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कौन हैं संध्या? जानें इस दिग्गज अभिनेत्री की अनकही कहानी

संध्या, जिनका असली नाम विजया देशमुख है, भारतीय सिनेमा की एक प्रमुख अभिनेत्री थीं। 1938 में कोच्चि में जन्मी संध्या ने अपने करियर की शुरुआत वी. शांताराम की फिल्म 'अमर भूपाली' से की। उन्होंने कई सफल फिल्मों में काम किया और अपने अद्वितीय नृत्य कौशल के लिए जानी गईं। उनके योगदान ने भारतीय सिनेमा में एक नई दिशा दी। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और उनके अद्वितीय कार्यों के बारे में।
 

संध्या का प्रारंभिक जीवन और करियर की शुरुआत

मुंबई, 3 अक्टूबर। 27 सितंबर 1938 को कोच्चि में जन्मी विजया देशमुख, जिन्हें फिल्मी दुनिया में संध्या के नाम से जाना जाता है, का परिवार थिएटर से जुड़ा हुआ था, जिसने उनके अंदर कला के प्रति रुचि जगाई। बेहतर करियर के अवसरों की तलाश में, वह अपनी बहन वत्सला के साथ मुंबई आ गईं। उनका फिल्मी सफर तब शुरू हुआ जब उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्माता वी. शांताराम की मराठी फिल्म 'अमर भूपाली' (1951) के लिए एक विज्ञापन का जवाब दिया।


संध्या का फिल्मी सफर

ऑडिशन के दौरान, शांताराम उनकी अनोखी आवाज से प्रभावित हुए, जो उनकी दूसरी पत्नी जयश्री की आवाज से मिलती-जुलती थी। इसी फिल्म के दौरान उन्हें 'संध्या' नाम मिला। फिल्म में उन्होंने 'गुणवती' का किरदार निभाया, जो इतनी सफल रही कि इसे 1952 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में 'पाल्मे डी ओर' के लिए नामांकित किया गया।


नृत्य और अभिनय में उत्कृष्टता

संध्या ने अपने करियर की शुरुआत में कोई प्रशिक्षित नृत्यांगना नहीं थीं, लेकिन 1955 की फिल्म 'झनक झनक पायल बाजे' के लिए उन्होंने मशहूर नर्तक गोपी कृष्ण के साथ महीनों तक प्रशिक्षण लिया। इस फिल्म में उनका प्रदर्शन इतना प्रभावशाली था कि इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।


अंतरराष्ट्रीय पहचान

फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' (1957) में उन्होंने 'चंपा' का किरदार निभाया, जो बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर और हॉलीवुड फॉरेन प्रेस द्वारा सैमुअल गोल्डविन अवार्ड से सम्मानित हुई। इस फिल्म के गीत में उनके मल्टीटास्किंग कौशल का प्रदर्शन हुआ।


संध्या का अद्वितीय योगदान

1961 में आई फिल्म 'स्त्री' में उन्होंने असली शेरों के साथ काम किया, जो उनके साहस का प्रमाण है। लगभग 40 वर्ष की आयु में, उन्होंने 'चंद्रकला' नामक एक चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने महाराष्ट्र के पारंपरिक 'लावणी' नृत्य को नई पहचान दी।


अंतिम वर्ष और विरासत

1970 के दशक के अंत में, संध्या ने अभिनय से संन्यास ले लिया और सार्वजनिक जीवन से दूर हो गईं। 2009 में 'नवरंग' की 50वीं वर्षगांठ पर उनकी उपस्थिति एक दुर्लभ घटना थी। 4 अक्टूबर 2025 को, उम्र संबंधी बीमारियों के कारण उनका निधन हो गया और उन्हें दादर के शिवाजी पार्क श्मशान घाट में अंतिम विदाई दी गई।