कौन हैं 'शोले' के सांभा? जानिए मैक मोहन की अनकही कहानी
मैक मोहन का अनोखा सफर
मुंबई, 23 अप्रैल। कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर ले जाता है, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। मैक मोहन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिन्हें आज भी लोग 'शोले' के सांभा के रूप में याद करते हैं। उनका सपना कभी अभिनेता बनने का नहीं था, बल्कि वह क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें भारतीय सिनेमा का एक महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया।
मैक मोहन का जन्म 24 अप्रैल 1938 को कराची में हुआ, जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था। उनका असली नाम मोहन माखीजानी था। उनके पिता ब्रिटिश आर्मी में कर्नल थे। 1940 में उनके पिता का ट्रांसफर कराची से लखनऊ हुआ, और उनका परिवार वहीं बस गया। मैक मोहन ने अपनी पढ़ाई लखनऊ में की, जहां उनके बचपन के सपने आकार लेने लगे।
बचपन से ही क्रिकेट के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। वह घंटों खेलते रहते थे और क्रिकेटर बनने का सपना देखते थे। उन्होंने मेहनत करके उत्तर प्रदेश की क्रिकेट टीम में जगह बनाई। उस समय उनका ध्यान केवल खेल पर था, लेकिन किस्मत ने उन्हें कुछ और ही रास्ता दिखाया।
अपने क्रिकेट के सपने को आगे बढ़ाने के लिए, वह 1952 में मुंबई चले आए। उन्हें उम्मीद थी कि यहां उन्हें बेहतर ट्रेनिंग मिलेगी। मुंबई आने के बाद उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। यहां उन्होंने पहली बार थिएटर और रंगमंच का अनुभव किया, जिसने उनके अंदर बदलाव ला दिया। धीरे-धीरे उनका झुकाव अभिनय की ओर बढ़ने लगा।
इसी दौरान उन्हें शौकत कैफी के एक नाटक में काम करने का अवसर मिला। पैसों की जरूरत के चलते उन्होंने बिना सोचे-समझे ऑडिशन दिया, और यहीं से उनके अभिनय करियर की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे वह थिएटर में काम करने लगे और अभिनय की बारीकियों को सीखने लगे। इसके बाद उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट से एक्टिंग की ट्रेनिंग भी ली।
1964 में फिल्म 'हकीकत' से उन्होंने बॉलीवुड में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाए, लेकिन असली पहचान उन्हें 1975 में आई फिल्म 'शोले' से मिली। इस फिल्म में उनका सांभा का किरदार इतना प्रसिद्ध हुआ कि वह हमेशा के लिए दर्शकों के दिलों में बस गया। उनका एक डायलॉग 'पूरे पचास हजार' आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रसिद्ध डायलॉग्स में से एक है।
इसके बाद मैक मोहन ने 'डॉन', 'कर्ज', 'सत्ते पे सत्ता', 'जंजीर', 'खून पसीना', 'शान' जैसी कई बड़ी फिल्मों में काम किया। अपने करियर में उन्होंने लगभग 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। वह अक्सर नकारात्मक या सहायक भूमिकाओं में नजर आते थे, लेकिन हर किरदार में अपनी अलग छाप छोड़ जाते थे।
मैक मोहन ने हिंदी के अलावा भोजपुरी, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बंगाली, हरियाणवी और सिंधी फिल्मों में भी काम किया। इसके साथ ही, उन्होंने अंग्रेजी, रूसी और स्पेनिश फिल्मों में भी अभिनय किया।
उनकी जिंदगी का अंतिम दौर कठिनाइयों से भरा रहा। फिल्म 'अतिथि तुम कब जाओगे' की शूटिंग के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई। जांच में पता चला कि उनके फेफड़ों में ट्यूमर है, जो बाद में कैंसर में बदल गया। लंबे इलाज के बावजूद, 10 मई 2010 को उनका निधन हो गया।