कौन हैं मदन मोहन? जानें इस संगीतकार की अनकही कहानी और उनके अमर गीत
मदान मोहन: एक संगीत जादूगर की कहानी
मुंबई, 13 जुलाई। दिल ढूंढता है, लग जा गले, और तू जहां-जहां चलेगा जैसे प्रसिद्ध गानों के रचनाकार मदन मोहन कोहली ने हिंदी फिल्म उद्योग में तीन दशकों तक महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हें आमतौर पर मदन मोहन के नाम से जाना जाता है, जो 1950 से 1970 के बीच भारतीय संगीत के क्षेत्र में एक प्रमुख संगीत निर्देशक रहे। उनकी गज़लें आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।
मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ, जहां उनके पिता राय बहादुर चुनीलाल कोहली काम कर रहे थे। बाद में उनका परिवार भारत लौट आया और लाहौर तथा मुंबई में बस गया। बचपन से ही संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली, लेकिन अधिकांश ज्ञान अनुभव और अभ्यास से प्राप्त किया।
अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, मदन मोहन ने 1943 में भारतीय सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेवा की। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद, उन्होंने सेना छोड़कर संगीत को अपना करियर बनाने का निर्णय लिया। इसके बाद, वे ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ और दिल्ली में कार्यक्रम सहायक के रूप में कार्यरत रहे। इस दौरान उन्हें उस्ताद फैयाज खान, उस्ताद अली अकबर खान, बेगम अख्तर और तलत महमूद जैसे महान कलाकारों के साथ काम करने का अवसर मिला।
मदन मोहन ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत सहायक संगीतकार के रूप में की। 1950 में फिल्म 'आंखें' से उन्हें स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने 'अदा', 'देख कबीरा रोया', 'शराबी', 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'हकीकत', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'मौसम', और 'लैला मजनूं' जैसी फिल्मों में संगीत दिया, जो आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है।
मदन मोहन को विशेष रूप से हिंदी फिल्मों में गज़लों को नई ऊंचाई देने के लिए याद किया जाता है। उनकी धुनों में शास्त्रीय संगीत की गहराई, भावनाओं की मिठास और शब्दों की संवेदनशीलता का अद्भुत संगम देखने को मिलता था। उन्होंने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज गायकों के साथ कई कालजयी गीत दिए। लता मंगेशकर के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से प्रसिद्ध रही और दोनों ने मिलकर अनेक अमर गीतों को जन्म दिया।
गीतकार राजा मेहदी अली खान, कैफी आजमी, राजिंदर कृष्ण, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ उनका रचनात्मक सहयोग भी बेहद सफल रहा। उनके संगीत की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि हर धुन में भावनाओं की गहराई और मधुरता सहज रूप से महसूस होती थी। 14 जुलाई 1975 को मात्र 51 वर्ष की आयु में मदन मोहन का निधन हो गया। हालांकि उनका जीवन अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को ऐसी अमूल्य धरोहर दी, जो आज भी उतनी ही लोकप्रिय है।
1960 और 1970 का दशक मदन मोहन के संगीत करियर का सबसे सफल और यादगार समय माना जाता है। इस दौरान उन्होंने 'वो कौन थी?', 'हकीकत', 'मेरा साया', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'हंसते ज़ख्म' और 'मौसम' जैसी फिल्मों में कालजयी संगीत दिया। 'लग जा गले', 'नैना बरसे', 'कर चले हम फ़िदा' और 'ये दुनिया ये महफिल' जैसे गीत आज भी सदाबहार हैं। वर्ष 1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। लता मंगेशकर ने उन्हें "गज़ल का शहजादा" कहा, जो उनकी संगीत प्रतिभा का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है।