कौन हैं ठुमरी की रानी सिद्धेश्वरी देवी? जानें उनकी अनोखी कहानी
संगीत की देवी का जन्म
वाराणसी, 17 मार्च। काशी की संकरी गलियों में सदियों से संगीत की महक बिखरी हुई है। इसी पवित्र भूमि पर 8 अगस्त 1908 को एक ऐसी अद्वितीय प्रतिभा का जन्म हुआ, जिसने ठुमरी को नई पहचान दी और शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनका नाम था सिद्धेश्वरी देवी, जिन्हें स्नेहपूर्वक 'मां' कहा जाता था और जिन्हें प्रसिद्ध गायिका केसरबाई केरकर ने 'ठुमरी क्वीन' की उपाधि से नवाजा।
संगीत की शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
सिद्धेश्वरी देवी का जन्म वाराणसी के कबीर चौरा में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ। उनके नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। बचपन में उन्हें 'गोलू' कहा जाता था, जो काशी के ज्योतिषी महादेव प्रसाद को पसंद नहीं आया, इसलिए उन्होंने उनका नाम सिद्धेश्वरी देवी रख दिया। उन्हें संगीत की शिक्षा पंडित सिया जी मिश्र, बड़े रामदास जी, उस्ताद रज्जब अली खां और इनायत खां जैसे महान गुरुओं से मिली।
संगीत में विविधता
बनारस घराने की इस गायिका ने खयाल, ध्रुपद, ठुमरी, दादरा, टप्पा, कजरी, चैती, होरी और भजन जैसे विभिन्न शैलियों को अपनी आवाज में जीवंत किया। उनकी ठुमरी में वात्सल्य, कृष्ण-भक्ति, श्रृंगार और विरह के भाव इतने गहरे और स्वाभाविक रूप से उभरते थे कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उनकी गायकी में ठहराव, भाव और बोल-बनाव की बारीकी बनारस घराने की विशेष पहचान थी।
संगीत को पूजा मानने वाली सिद्धेश्वरी
एक बार सिद्धेश्वरी देवी ने कहा था, “संगीत मेरे लिए पूजा है। जब मैं गाती हूं, तो ऐसा लगता है जैसे गंगा मैया और कृष्ण मुरारी मेरे सामने हैं।” जयपुर-अतरौली घराने की प्रसिद्ध गायिका केसरबाई केरकर, जिन्हें रवींद्रनाथ टैगोर ने 'सुरश्री' की उपाधि दी थी, ने सिद्धेश्वरी देवी को 'ठुमरी क्वीन' का खिताब दिया।
संगीत का जादू और बनारसी अंदाज
बनारस की गलियों, गंगा के घाट और वहां की होली ने उनकी कजरी और होरी को प्रेरित किया। एक बार 'सांझ भई घर आओ नंदलाला' गाते समय एक श्रोता मंच पर आईं और बोलीं, “मुझे अपने बेटे की चिंता हो रही है।” सिद्धेश्वरी ने मुस्कुराते हुए कहा, “आपने मेरी गायकी को सार्थक कर दिया, जाइए अपने लाल से मिलिए।”
उनका बनारसी अंदाज भी अद्भुत था। ओरछा के राजदरबार में गाते समय कुछ लोगों की कानाफूसी पर उन्होंने गाना रोककर गरजते हुए कहा था, “संगीत सुनने की क्षमता नहीं, तो बाहर जाओ!”
सम्मान और विरासत
सिद्धेश्वरी देवी को पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके जीवन और संगीत पर उनकी बेटी सविता देवी ने किताब 'मां... सिद्धेश्वरी' लिखी, जिसमें ठुमरी गायिकाओं को मिलने वाली सामाजिक उपेक्षा और सिद्धेश्वरी के आध्यात्मिक समर्पण की कहानी है। सविता देवी ने 'सिद्धेश्वरी देवी एकेडमी ऑफ इंडियन म्यूजिक' के माध्यम से उनकी विरासत को आगे बढ़ाया।
18 मार्च 1977 को सिद्धेश्वरी देवी ने अंतिम सांस ली।