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कश्मीरी लाल जाकिर: साहित्य के माध्यम से बंटवारे की पीड़ा को व्यक्त करने वाले महान लेखक

कश्मीरी लाल जाकिर, एक प्रमुख साहित्यकार, ने अपनी लेखनी के माध्यम से कश्मीर की पीड़ा और बंटवारे के घावों को उजागर किया। उनका जन्म 1919 में हुआ और उन्होंने समाज सुधार के लिए कई पुस्तकें लिखीं। जाकिर साहब ने न केवल लेखन किया, बल्कि समाज के उत्थान के लिए भी कार्य किए। उन्हें कई पुरस्कार मिले, जिनमें पद्मश्री भी शामिल है। उनकी रचनाएं आज भी पाठकों को कश्मीर की सच्चाई और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती हैं।
 

कश्मीरी लाल जाकिर का जीवन और कार्य




नई दिल्ली, 7 अप्रैल। कश्मीर की पीड़ा और बंटवारे के घावों को अपनी लेखनी से उजागर करने वाले कश्मीरी लाल जाकिर एक प्रमुख साहित्यकार थे। उन्होंने न केवल कहानियों का लेखन किया, बल्कि उस समय की सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय समस्याओं को भी अपने काम में शामिल किया, जो आज भी पाठकों को सोचने पर मजबूर करती हैं।


कश्मीरी लाल जाकिर का जन्म 7 अप्रैल 1919 को पश्चिमी पंजाब के बेगाबनियान गांव में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। बंटवारे की त्रासदी को नजदीक से देखने के बाद, उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पुंछ और श्रीनगर में प्राप्त की। इसके बाद, उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से बीए और एमए की डिग्री हासिल की और लेखन को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।


उनकी लेखनी में समाज सुधार की गहरी भावना थी। उन्होंने प्रौढ़ शिक्षा, श्रमिकों की शिक्षा, पर्यावरण और जनसंख्या नियंत्रण जैसे विषयों पर लगभग 80 पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में 'खजुराहो की एक रात', 'हथेली पर सूरज', 'अंगूठे का निशान', 'उदास शाम के आखिरी लम्हें' और 'जाकिर की तीन कहानियां' शामिल हैं।


बंटवारे के बाद कश्मीर में हुई हिंसा ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने अपनी कई रचनाओं में इस दर्द को व्यक्त किया, जैसे 'जब कश्मीर जल रहा था', 'खून फिर खून है' और 'एक लड़की भटकी हुई'। उनकी लेखनी में दहेज प्रथा, बंधुआ मजदूरी, महिला सशक्तीकरण और राष्ट्रीय एकता जैसे सामाजिक मुद्दों पर गहरी चिंता दिखाई देती है।


जाकिर साहब अक्सर कहा करते थे कि यदि वे लेखक नहीं होते, तो वे देश सेवा के लिए सेना में भर्ती हो जाते। उन्होंने केवल लेखन नहीं किया, बल्कि समाज के उत्थान के लिए भी कार्य किया। वह हरियाणा उर्दू अकादमी के सचिव रहे और कई सरकारी कार्यक्रमों से जुड़े रहे। उन्होंने चंडीगढ़ की एक झुग्गी बस्ती को गोद लेकर प्रौढ़ शिक्षा का अभियान चलाया और बेरोजगार युवाओं को करियर गाइडेंस प्रदान किया।


साहित्यिक और सामाजिक सेवाओं के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले, जैसे 1986 में गालिब सम्मान, 1991 में राष्ट्रीय नेहरू शिक्षा सम्मान और 2006 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री। हरियाणा सरकार ने भी उन्हें सम्मानित किया। उनकी कई किताबें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के अलावा अन्य विदेशी भाषाओं में भी अनुवादित हुईं।


जाकिर साहब का निधन 31 अगस्त 2016 को 97 वर्ष की आयु में हुआ। उनकी रचनाएं आज भी पाठकों को कश्मीर की सच्चाई, बंटवारे के दर्द और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती हैं।