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आर्यभट्ट का ज़ीरो: एक प्रेरणादायक यात्रा की कहानी

फिल्म 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' एक मध्यमवर्गीय युवक की संघर्ष और पुनर्निर्माण की कहानी है। यह फिल्म न केवल UPSC की तैयारी की कहानी है, बल्कि एक बेटे की अपने पिता का सम्मान पाने की भावनात्मक यात्रा भी है। निर्देशक कमल चंद्र ने इसे वास्तविकता के करीब रखा है, जबकि अभिनेता हिमांश कोहली और नीरज सूद ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। हालांकि, कहानी में नयापन की कमी और धीमा दूसरा हाफ इसे एक बेहतरीन फिल्म बनने से रोकते हैं। जानें इस फिल्म के बारे में और क्या यह देखने लायक है।
 

फिल्म की कहानी

भारतीय सिनेमा में असफलताओं से उबरने और पहचान बनाने की कहानियों का एक विशेष स्थान है। कमल चंद्रा द्वारा निर्देशित फिल्म 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' एक मध्यमवर्गीय युवक की संघर्ष और पुनर्निर्माण की कहानी प्रस्तुत करती है। हिमांश कोहली और सोनाली सहगल की मुख्य भूमिकाओं वाली यह फिल्म केवल UPSC की तैयारी या दिल टूटने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक बेटे की अपने पिता का सम्मान पाने और समाज द्वारा 'ज़ीरो' के टैग को मिटाने की भावनात्मक यात्रा है।


कहानी और प्लॉट

कहानी उत्तराखंड के एक साधारण परिवार के ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव, जिसे 'बग्गू' कहा जाता है (हिमांश कोहली), के इर्द-गिर्द घूमती है। बग्गू के पिता, आर्यभट्ट श्रीवास्तव (नीरज सूद), एक सरकारी दफ्तर में ग्रुप-D कर्मचारी हैं और अपने बेटे से बहुत उम्मीदें रखते हैं।


बग्गू की जिंदगी में असली बदलाव तब आता है जब उसकी प्रेमिका रिंकू (सोनाली सहगल) उसकी असफलताओं से तंग आकर एक SDM से शादी कर लेती है। दिल टूटने के बाद, बग्गू दिल्ली के मुखर्जी नगर पहुंचता है और UPSC की तैयारी करने का संकल्प लेता है। हालांकि, बार-बार की असफलता और समाज का 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' कहकर तंज कसना उसके आत्मविश्वास को तोड़ देता है। फिल्म इसी यात्रा को दर्शाती है कि क्या बग्गू अपनी असली पहचान को पहचान पाता है।


निर्देशन और लेखन

कमल चंद्र ने फिल्म को अधिक ड्रामा और बनावटीपन से दूर रखा है, और वास्तविकता के करीब रहने की कोशिश की है। उन्होंने छोटे शहर के युवक की सोच और मध्यमवर्गीय परिवार के संघर्षों को ईमानदारी से प्रस्तुत किया है। लेखक तारिक़ मोहम्मद की कहानी भले ही नई न लगे, लेकिन उनके संवाद और परिस्थितियाँ स्वाभाविक और विश्वसनीय हैं। पिता और बेटे के बीच की बातचीत विशेष रूप से दिल को छू लेने वाली है। निर्देशक ने कॉमेडी और ड्रामा के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है, जिससे कहानी दिलचस्प बनी रहती है। हालांकि, कुछ हिस्सों में उनकी पकड़ कमजोर पड़ जाती है, खासकर जब फिल्म अपने मुख्य विषय से भटककर गैर-जरूरी उप-कहानियों में उलझ जाती है।


तकनीकी पहलू और प्रोडक्शन

तकनीकी दृष्टि से फिल्म का काम संतोषजनक है। सिनेमैटोग्राफी ने उत्तराखंड के शांत नज़ारों और दिल्ली के मुखर्जी नगर की भीड़-भाड़ वाली गलियों के बीच का अंतर खूबसूरती से दिखाया है। बैकग्राउंड स्कोर भावनात्मक क्षणों को प्रभावी बनाता है। हालांकि, एडिटिंग फिल्म के कमजोर पहलुओं में से एक है। यदि दूसरे हाफ में कुछ गैर-जरूरी दृश्यों को काट दिया जाता, तो फिल्म की गति और बेहतर होती।


परफॉर्मेंस

हिमांश कोहली ने 'बग्गू' के किरदार में बेहतरीन प्रदर्शन किया है। उन्होंने एक परेशान और दिल से मासूम युवक के जज़्बातों को प्रभावी ढंग से दिखाया है। नीरज सूद ने बग्गू के पिता के रूप में फिल्म की भावनात्मक गहराई को बढ़ाया है। रवि किशन ने अपने देसी अंदाज़ से दर्शकों को हंसाया है। सोनाली सहगल ने समझदार गर्लफ्रेंड 'रिंकू' के किरदार में न्याय किया है।


कमज़ोर पहलू

फिल्म में कुछ कमियाँ हैं जो इसे बेहतरीन फिल्म बनने से रोकती हैं। कहानी में नयापन की कमी है और दर्शक पहले से ही अनुमान लगा सकते हैं कि आगे क्या होगा। फिल्म का दूसरा हाफ धीमा हो जाता है और कुछ किरदारों का विकास भी बनावटी लगता है। अंत भी अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ता।


अंतिम फैसला

'आर्यभट्ट का ज़ीरो' एक सरल फिल्म है जो सकारात्मक संदेश देती है। हालांकि इसकी जानी-पहचानी कहानी और धीमा दूसरा हाफ इसे उस मुकाम तक नहीं पहुँचाते, जिसकी यह उम्मीद करती है। यदि आप परिवार के साथ देखने के लिए एक हल्की-फुल्की, इमोशनल और प्रेरणादायक फिल्म की तलाश में हैं, तो यह एक बार देखने लायक है।