अमरीश पुरी: खलनायक से लेकर अंतरराष्ट्रीय पहचान तक का सफर
अमरीश पुरी का अद्वितीय सफर
मुंबई, 21 जून। हिंदी सिनेमा में खलनायकों की चर्चा करते समय अमरीश पुरी का नाम सबसे पहले आता है। उनकी गहरी आवाज और प्रभावशाली अभिनय ने उन्हें एक ऐसा कलाकार बना दिया, जिसे दर्शक हमेशा याद रखते हैं। हालांकि, उनका सफर आसान नहीं था। फिल्मों में कदम रखने से पहले, अमरीश पुरी सरकारी नौकरी कर रहे थे और साथ ही थियेटर में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे।
अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब के नवांशहर में हुआ। उनके बड़े भाई मदन पुरी और चमन पुरी भी अभिनय की दुनिया से जुड़े थे, और मशहूर गायक के. एल. सहगल उनके रिश्तेदार थे। इसके बावजूद, अमरीश पुरी को फिल्मों में जगह बनाने में कठिनाई का सामना करना पड़ा। युवा अवस्था में, वह अभिनेता बनने का सपना लेकर मुंबई आए और हीरो बनने के लिए स्क्रीन टेस्ट दिया, लेकिन पहले प्रयास में असफल रहे। इसके बाद उन्होंने कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) में नौकरी शुरू की।
हालांकि, उनकी कला की चाहत उन्हें हमेशा अभिनय की ओर खींचती रही। नौकरी के साथ-साथ, उन्होंने थियेटर में भी काम किया और अपनी अभिनय क्षमता को निखारा। उन्होंने सत्यदेव दुबे जैसे प्रमुख रंगकर्मियों के साथ काम किया, जिससे उनकी पहचान एक उत्कृष्ट थियेटर कलाकार के रूप में बनने लगी। अंततः, थियेटर ने ही उन्हें फिल्मों में प्रवेश दिलाया।
करीब 21 साल तक नौकरी करने के बाद, जब उन्हें अभिनय में अच्छे अवसर मिलने लगे, तो उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। उस समय उनकी उम्र लगभग 40 वर्ष थी।
अमरीश पुरी का फिल्मी सफर छोटे किरदारों से शुरू हुआ। 1971 में आई फिल्म 'रेशमा और शेरा' में उन्होंने काम किया। इसके बाद, उन्होंने कई फिल्मों में विभिन्न भूमिकाएं निभाईं। श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी जैसे निर्देशकों की फिल्मों ने उनके अभिनय को एक नई पहचान दी। 'निशांत', 'मंथन' और 'अर्ध सत्य' जैसी फिल्मों में उनके काम को बहुत सराहा गया।
1980 में आई फिल्म 'हम पांच' के बाद, उनकी पहचान एक प्रमुख खलनायक के रूप में बनने लगी। इसके बाद 'विधाता', 'नायक', 'लोहा', 'दामिनी', 'फूल और कांटे', 'हीरो', 'मेरी जंग', 'नगीना' जैसी कई फिल्मों में उन्होंने यादगार किरदार निभाए। 1987 में आई फिल्म 'मिस्टर इंडिया' ने उन्हें अमर कर दिया। इस फिल्म में उनका किरदार मोगैम्बो इतना प्रसिद्ध हुआ कि लोग उन्हें उनके असली नाम से ज्यादा मोगैम्बो के नाम से जानने लगे। 'मोगैम्बो खुश हुआ' हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार डायलॉग्स में से एक बन गया।
अमरीश पुरी ने केवल खलनायकों के किरदार नहीं निभाए। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में चौधरी बलदेव सिंह का किरदार, और 'परदेस' तथा 'विरासत' जैसी फिल्मों में सख्त पिता के किरदार निभाए। हॉलीवुड फिल्म 'इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ डूम' में मोला राम का किरदार निभाकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पहचान भी बनाई।
अपने करियर में, अमरीश पुरी ने 400 से अधिक फिल्मों में काम किया। उन्हें 1979 में थिएटर के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला और 'मेरी जंग', 'घातक', और 'विरासत' जैसी फिल्मों के लिए फिल्मफेयर अवार्ड भी प्राप्त हुए।
12 जनवरी 2005 को अमरीश पुरी का निधन हो गया। वह एक रक्त संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे। उनके जाने के बाद भी उनकी आवाज, उनके किरदार और उनका अभिनय आज भी दर्शकों के दिलों में जीवित है।