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हर्षद मेहता: कैसे एक शेयर दलाल ने भारतीय वित्तीय व्यवस्था को हिला दिया?

हर्षद मेहता की कहानी एक ऐसे शेयर दलाल की है जिसने भारतीय शेयर बाजार में असाधारण प्रभाव डाला। 1990 के दशक में, जब वह 'बिग बुल' के नाम से मशहूर हुआ, उसकी सफलता ने पूरे देश को हिला दिया। लेकिन यह कहानी केवल धन कमाने की नहीं है; यह उस समय की वित्तीय व्यवस्था की कमजोरियों और सुधारों की भी है। जानें कैसे हर्षद मेहता ने शेयर बाजार में एक नया अध्याय लिखा और उसके बाद क्या बदलाव आए।
 

हर्षद मेहता का वित्तीय सफर

Harshad Mehta Stock Market Scam Story

Harshad Mehta Stock Market Scam Story

हर्षद मेहता का घोटाला: एक समय था जब भारत में शेयर बाजार आम लोगों के लिए नहीं था। जब भी शेयर बाजार का नाम लिया जाता, तो बड़े दलालों, भारी रकम और बंद कमरों में होने वाले सौदों की बातें होती थीं। लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में एक नाम हर जगह गूंजने लगा - हर्षद मेहता। उसे "बिग बुल" के नाम से जाना जाने लगा। कहा जाता था कि जिस शेयर को वह छूता, उसकी कीमत आसमान छूने लगती। उसके पास इतनी दौलत थी कि वह बड़े-बड़े निवेशकों को चुनौती दे सकता था। मुंबई के समुद्र किनारे उसका भव्य निवास, महंगी गाड़ियाँ और शेयर बाजार में उसकी पकड़ उस समय की सफलता की नई परिभाषा बन गई। लेकिन यह कहानी जल्द ही भारत के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में बदल गई।


हर्षद मेहता का उदय

हर्षद मेहता का जन्म 1954 में हुआ। वह गुजरात से मुंबई आया और शुरुआत में छोटी-मोटी नौकरियों के बाद शेयर बाजार में कदम रखा। धीरे-धीरे उसने बाजार की बारीकियों को समझा और एक सफल दलाल के रूप में अपनी पहचान बनाई। उस समय का शेयर बाजार आज के मुकाबले बहुत अलग था। न तो मोबाइल पर शेयर खरीदने की सुविधा थी और न ही हर निवेशक के पास ऑनलाइन खाते थे। शेयरों की खरीद-बिक्री कागजों और दलालों पर निर्भर थी। हर्षद मेहता ने इस व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठाया। 1991 में जब देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था, तब आर्थिक सुधारों के चलते शेयर बाजार में तेजी आई और हर्षद मेहता का प्रभाव बढ़ा।


बिग बुल का उदय

हर्षद मेहता ने कुछ कंपनियों के शेयरों में बड़े पैमाने पर निवेश किया। जब वह बड़ी मात्रा में शेयर खरीदता, तो उनकी मांग बढ़ जाती और कीमतें ऊँची होने लगतीं। इससे अन्य निवेशक भी उन शेयरों की ओर आकर्षित होते। यह एक चक्र बन गया। हर्षद मेहता की असली ताकत केवल शेयरों का चयन नहीं था, बल्कि वह जिस पैसे से बड़े सौदे कर रहा था, वह महत्वपूर्ण था। यही वह कड़ी थी जिसने बाद में पूरे देश को हिला दिया।


बैंकिंग और शेयर बाजार का जाल

1990 के दशक की शुरुआत में बैंकों के बीच सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री के लिए कई व्यवस्थाएँ थीं। इनमें बैंक रसीद जैसी व्यवस्था भी शामिल थी। लेकिन इस व्यवस्था का दुरुपयोग करके पैसे को ऐसे स्थानों पर पहुँचाया गया जहाँ उनका उपयोग नहीं होना चाहिए था। जांच में पता चला कि कुछ बैंकों और दलालों के बीच ऐसे लेन-देन हुए जिनमें बैंकिंग का पैसा शेयर बाजार में लगाया गया। हर्षद मेहता इस व्यवस्था का सबसे चर्चित नाम बन गया।


1992 का घोटाला

1991 और 1992 के बीच भारतीय शेयर बाजार में तेजी आई और हर्षद मेहता इस तेजी का सबसे चर्चित चेहरा बन गया। लेकिन जब बाजार गिरना शुरू हुआ, तो यह स्पष्ट हो गया कि इस तेजी के पीछे केवल निवेश का पैसा नहीं था। पत्रकार सुचेता दलाल की रिपोर्टों ने इस मामले को सार्वजनिक चर्चा में लाया। इसके बाद कई जांचें हुईं और सरकार ने विशेष अदालत का गठन किया। हर्षद मेहता की संपत्तियाँ भी इस कार्रवाई के दायरे में आईं।


क्या टैक्स नियमों में बदलाव हर्षद मेहता के कारण हुआ?

1992 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने वित्तीय संपत्तियों को संपत्ति कर से बाहर रखने का प्रस्ताव रखा। यह कहना गलत होगा कि हर्षद मेहता के कारण टैक्स नियम बदले गए। असल में यह व्यापक आर्थिक सुधारों का हिस्सा था।


हर्षद मेहता की विरासत

हर्षद मेहता की कहानी केवल एक अमीर दलाल की नहीं है, बल्कि यह उस समय की कहानी है जब भारत का शेयर बाजार पुराने कागजी और सीमित दायरे वाले बाजार से निकलकर आधुनिक पूंजी बाजार बनने की ओर बढ़ रहा था। 1992 के बाद भारत ने नियमों और सेबी की बढ़ी हुई ताकत के माध्यम से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की।