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भारत के 50 अद्भुत आविष्कार: कैसे तकनीक ने बदली हमारी ज़िंदगी?

इस लेख में हम भारत के 50 महत्वपूर्ण आविष्कारों की यात्रा पर चलेंगे, जो न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करते हैं। जानें कैसे रेलगाड़ी, साइकिल, प्रिंटिंग प्रेस, सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, पेजर और टाइपराइटर जैसे आविष्कारों ने भारतीय समाज को नया आकार दिया। यह लेख आपको इन आविष्कारों के पीछे की कहानियों और उनके सामाजिक प्रभावों के बारे में जानकारी देगा।
 

भारत के आविष्कारों का ऐतिहासिक सफर

भारत के पहले आविष्कारों का इतिहास: पहले भारत की सड़कों पर बैलगाड़ियों से यात्रा होती थी, संदेश भेजने के लिए घुड़सवार और हरकारे निकलते थे, रात में दीये और मशालें जलती थीं, और किसी घटना की जानकारी आने में हफ्तों लग जाते थे। फिर एक समय आया जब लोहे की पटरियों पर चलने वाली रेलगाड़ियाँ दूरियों को कम करने लगीं, बिजली के बल्बों ने रात का चेहरा बदल दिया, टेलीग्राफ ने संदेशों को मिनटों में पहुँचाना संभव बना दिया, और छापाखानों ने विचारों को लाखों लोगों तक पहुँचाने की क्षमता दी। कैमरे ने यादों को तस्वीरों में कैद करना शुरू किया, ग्रामोफोन ने ध्वनियों को सहेज लिया, और सिनेमा ने चलती-फिरती तस्वीरों की दुनिया बनाई, जिसने मनोरंजन की परिभाषा को ही बदल दिया। बीसवीं सदी के अंत तक आते-आते कंप्यूटर, मोबाइल फोन और इंटरनेट ने मानव जीवन को एक नई दिशा में मोड़ दिया, जिसकी कल्पना पिछली पीढ़ियों ने शायद ही की थी।

हालांकि, आधुनिक भारत का निर्माण केवल तकनीकी आविष्कारों की कहानी नहीं है। इसके पीछे व्यापारिक हितों, औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं, औद्योगिक क्रांति, वैज्ञानिक अनुसंधान, भारतीय उद्यमिता और समाज की बदलती आकांक्षाओं का जटिल इतिहास छिपा हुआ है। अंग्रेजों ने भारत में रेल, तार और आधुनिक संचार व्यवस्था का विस्तार मुख्यतः प्रशासनिक नियंत्रण, व्यापार और सैन्य आवश्यकताओं के लिए किया। पुर्तगाली मिशनरियों के माध्यम से छपाई की नई तकनीक आई, और यूरोपीय व्यापारियों ने भारतीय बाजारों में उपभोक्ता वस्तुओं को पेश किया। दूसरी ओर, भारतीय वैज्ञानिकों, उद्यमियों, समाज सुधारकों और स्वतंत्रता सेनानियों ने इन साधनों को केवल विदेशी प्रभाव का प्रतीक नहीं बनने दिया। उन्होंने इन्हें शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन, सार्वजनिक संवाद, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय चेतना के विस्तार का माध्यम बनाया। आज जो चीजें सामान्य भारतीय जीवन का हिस्सा हैं, उनमें से कई कभी इतनी दुर्लभ और महँगी थीं कि उनका उपयोग केवल राजपरिवारों, उच्चाधिकारियों या संपन्न परिवारों तक सीमित था।

इस ऐतिहासिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी तकनीक का भारत में पहली बार आना, उसका नियमित उपयोग शुरू होना और आम जनता तक पहुँचना तीन अलग-अलग घटनाएँ हैं। उदाहरण के लिए, भारत में सार्वजनिक इंटरनेट सेवा 1995 में शुरू हुई, लेकिन वैज्ञानिक और शैक्षणिक संस्थान इससे कई वर्ष पहले कंप्यूटर नेटवर्क के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संपर्क स्थापित कर चुके थे। इसी प्रकार, हवाई जहाज की पहली उड़ानों, नियमित विमान सेवाओं और आधुनिक हवाई अड्डों का इतिहास भी अलग है। इसलिए किसी आविष्कार के आगमन को केवल एक तारीख में समेटना हमेशा उचित नहीं होता। कई तकनीकों के शुरुआती प्रयोगों के अभिलेख अधूरे हैं। जहाँ प्रमाण उपलब्ध हैं, वहाँ निश्चित तारीखों का उल्लेख किया जा सकता है और जहाँ इतिहास में मतभेद हैं, वहाँ अनुमान को निर्विवाद तथ्य मानने से बचना आवश्यक है।

आइए, लगभग साढ़े चार शताब्दियों के इतिहास में प्रवेश करें और जानें उन 50 महत्वपूर्ण आविष्कारों, तकनीकों, उपकरणों, सेवाओं और खेलों की कहानी, जिन्होंने भारत की यात्रा, संचार, चिकित्सा, खान-पान, शिक्षा, मनोरंजन, कारोबार और सार्वजनिक जीवन को धीरे-धीरे नया स्वरूप प्रदान किया।


1. रेलगाड़ी: 16 अप्रैल, 1853 को शुरू हुई भारतीय परिवहन की नई यात्रा

भारत में पहली नियमित यात्री रेलगाड़ी 16 अप्रैल, 1853 को तत्कालीन बंबई के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के बीच चली थी। लगभग 34 किलोमीटर की इस ऐतिहासिक यात्रा के लिए 14 डिब्बों वाली ट्रेन को तीन भाप इंजनों ने खींचा था, जिनके नाम साहिब, सिंध और सुल्तान थे। इस उद्घाटन यात्रा में लगभग 400 आमंत्रित यात्रियों ने हिस्सा लिया। यह सेवा लॉर्ड डलहौजी के गवर्नर जनरल रहते शुरू हुई थी और इसका संचालन ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे ने किया था।




हालाँकि भारत में रेल पटरियों तथा रेल आधारित माल ढुलाई के प्रयोग इससे पहले भी हुए थे। लेकिन 1853 की यात्रा ने आधुनिक सार्वजनिक यात्री रेल सेवा की औपचारिक शुरुआत की। ब्रिटिश शासन के लिए रेलवे का प्रमुख महत्व बंदरगाहों तक कच्चा माल पहुँचाने, तैयार वस्तुओं के व्यापार, सैनिकों की आवाजाही और विशाल भूभाग पर प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने में था। इसके बावजूद रेलगाड़ी का सामाजिक प्रभाव इन उद्देश्यों से कहीं व्यापक निकला। लोगों की यात्राएँ सुलभ होने लगीं, विभिन्न क्षेत्रों के बीच व्यापार बढ़ा, तीर्थयात्राओं को नई गति मिली और अलग-अलग भाषाओं तथा संस्कृतियों के भारतीय अधिक निकट आए। धीरे-धीरे रेलवे राष्ट्रीय एकीकरण की महत्वपूर्ण संरचना बन गई और स्वतंत्रता के बाद देश की अर्थव्यवस्था तथा सामान्य जनजीवन की जीवनरेखा के रूप में विकसित हुई।


2. साइकिल: उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पहुँची आम आदमी की सवारी

साइकिल का भारत में प्रसार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध, विशेषकर 1880 और 1890 के दशकों में तेज हुआ। प्रारंभिक साइकिलें मुख्यतः ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों से आयात की जाती थीं। कलकत्ता, बंबई और मद्रास जैसे प्रमुख औपनिवेशिक नगरों में ब्रिटिश अधिकारियों, सैनिकों, व्यापारियों तथा संपन्न भारतीयों के बीच साइकिल चलाने का शौक विकसित हुआ। पारसी समुदाय और आधुनिक शहरी जीवन से जुड़े परिवारों में भी यह साधन लोकप्रिय होने लगा। शुरुआती साइकिलें महँगी थीं और उनकी मरम्मत तथा रखरखाव के लिए विशेष सुविधाओं की आवश्यकता होती थी, इसलिए सामान्य भारतीयों तक उनकी पहुँच सीमित रही।




धीरे-धीरे साइकिल डाक वितरण, छोटे व्यापार, कार्यालय आने-जाने और व्यक्तिगत यात्रा का उपयोगी साधन बन गई। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भारतीय बाजार में साइकिलों की माँग बढ़ी और हिंद साइकिल्स जैसी कंपनियों ने घरेलू उत्पादन का आधार विकसित किया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय साइकिल उद्योग के विस्तार ने इसे विद्यार्थियों, शिक्षकों, किसानों, मजदूरों, डाक कर्मचारियों तथा छोटे व्यापारियों की रोजमर्रा की सवारी बना दिया। ग्रामीण भारत में साइकिल ने शिक्षा और रोजगार तक पहुँच बढ़ाने में विशेष भूमिका निभाई।


3. प्रिंटिंग प्रेस: 1556 में गोवा से शुरू हुई मुद्रण की आधुनिक परंपरा

भारत में आधुनिक यूरोपीय शैली की चल अक्षरों वाली प्रिंटिंग प्रेस का आगमन 1556 में हुआ था। पुर्तगाली जेसुइट मिशनरियों द्वारा लाई गई यह मशीन मूलतः इथियोपिया भेजी जानी थी। लेकिन परिस्थितियों के कारण उसे गोवा में ही स्थापित कर दिया गया। पुराना गोवा स्थित सेंट पॉल कॉलेज में सितंबर 1556 के आसपास मुद्रण व्यवस्था स्थापित हुई और उसी वर्ष दार्शनिक तथा धार्मिक विषयों से संबंधित आरंभिक सामग्री छापी गई। 'कॉन्क्लूज़ोएस' नामक दार्शनिक शोध-प्रस्तावों के संग्रह को भारत की आरंभिक मुद्रित कृतियों में गिना जाता है।




मुद्रण कार्य का नेतृत्व जुआँ दे बुस्तामांते ने किया, जिनकी सहायता एक भारतीय मुद्रक ने भी की थी। वर्ष 1557 में ईसाई धार्मिक शिक्षाओं से संबंधित अन्य सामग्री भी छापी गई। इस प्रकार 1556 को भारतीय उपमहाद्वीप में यूरोपीय शैली की आधुनिक मुद्रण तकनीक के व्यवस्थित आगमन का महत्वपूर्ण वर्ष माना जाता है। हालाँकि भारत में पांडुलिपियों, मुहरों, वस्त्र छपाई और विभिन्न प्रकार की मुद्रांकन परंपराओं का इतिहास इससे बहुत पुराना है। लेकिन यांत्रिक छपाई ने पुस्तकों, धार्मिक ग्रंथों, पाठ्यसामग्री और बाद में समाचारपत्रों के बड़े पैमाने पर प्रकाशन का रास्ता खोला। इसी तकनीक ने आगे चलकर भारतीय भाषाओं में जनजागरण, सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक आधार प्रदान किया।


4. सिनेमा: 7 जुलाई, 1896 को बंबई में चलती तस्वीरों का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन

भारत में आधुनिक चलचित्र प्रदर्शन का ऐतिहासिक आरंभ 7 जुलाई, 1896 को बंबई के वाटसन होटल में हुआ था। फ्रांस के ल्यूमियर बंधुओं द्वारा विकसित सिनेमैटोग्राफ तकनीक के माध्यम से उनके प्रतिनिधियों ने छोटे-छोटे मूक चलचित्र प्रदर्शित किए। इनमें रेलवे स्टेशन पर आती ट्रेन, कारखाने से निकलते कर्मचारी और दैनिक जीवन के दृश्यों से संबंधित फिल्में शामिल थीं। पर्दे पर चलती तस्वीरें देखना उस समय दर्शकों के लिए असाधारण अनुभव था। प्रारंभिक प्रदर्शनों के टिकट महँगे होने के कारण दर्शकों में मुख्यतः यूरोपीय निवासी और संपन्न भारतीय शामिल थे। लेकिन शीघ्र ही चलचित्र प्रदर्शन का दायरा बढ़ने लगा।




हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर, जिन्हें सावे दादा कहा जाता है, भारतीय प्रारंभिक चलचित्र निर्माण के महत्वपूर्ण अग्रदूत बने। उन्होंने कुश्ती जैसे भारतीय जीवन के दृश्यों को फिल्माया। इसके बाद 1913 में दादासाहेब फाल्के ने 'राजा हरिश्चंद्र' का निर्माण किया, जिसे भारत की पहली पूर्ण लंबाई वाली स्वदेशी कथात्मक मूक फिल्म के रूप में व्यापक मान्यता प्राप्त है। सिनेमा ने आगे चलकर भारतीय साहित्य, संगीत, नाटक, लोकसंस्कृति और सामाजिक चिंतन को एक नया माध्यम दिया तथा दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में से एक की नींव रखी।


5. रेडियो: 1923 में सुनाई दी आधुनिक प्रसारण की शुरुआती आवाज

भारत में संगठित रेडियो प्रसारण के शुरुआती प्रयोग 1923 में बंबई के रेडियो क्लब तथा अन्य रेडियो उत्साही समूहों द्वारा किए गए। शुरुआती रेडियो प्रसारण सीमित क्षेत्र तक पहुँचते थे और इन्हें सुनने के लिए विशेष रेडियो रिसीवर की जरूरत होती थी। वर्ष 1927 में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी ने बंबई और कलकत्ता में रेडियो केंद्रों की स्थापना की। आर्थिक समस्याओं के कारण यह निजी व्यवस्था अधिक समय तक नहीं चल सकी और बाद में प्रसारण सेवाएँ सरकारी नियंत्रण में आ गईं। वर्ष 1936 में इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रखा गया, जिसे आगे चलकर आकाशवाणी के नाम से व्यापक पहचान मिली। प्रारंभिक दौर में रेडियो सेट महँगे होते थे और मुख्यतः संपन्न परिवारों, क्लबों तथा संस्थानों में रखे जाते थे।




समय के साथ संगीत, समाचार, नाटक, कृषि संबंधी जानकारी, शैक्षिक कार्यक्रम और सरकारी घोषणाओं ने रेडियो को जनसंचार का प्रभावी माध्यम बना दिया। स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में भी रेडियो की भूमिका महत्वपूर्ण रही। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में वह लंबे समय तक ऐसा साधन बना रहा, जिसके माध्यम से दूरदराज के लोग देश-दुनिया की घटनाओं से जुड़े रहे।


6. टेलीविजन: 15 सितंबर, 1959 से भारत में तस्वीरों के प्रसारण की शुरुआत

भारत में टेलीविजन प्रसारण की औपचारिक शुरुआत 15 सितंबर, 1959 को नई दिल्ली में एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में हुई। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसका उद्घाटन किया था। यूनेस्को के सहयोग तथा विदेशी तकनीकी सहायता से स्थापित यह प्रारंभिक सेवा आकाशवाणी के अंतर्गत संचालित होती थी। उस समय केवल श्वेत-श्याम प्रसारण उपलब्ध था और कार्यक्रम सीमित अवधि के लिए दिखाए जाते थे। प्रारंभिक कार्यक्रमों का उद्देश्य शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, स्वास्थ्य और सामुदायिक विकास को प्रोत्साहित करना था। कुछ स्थानों पर सामुदायिक टेलीविजन सेट लगाए गए, जहाँ लोग एकत्र होकर प्रसारण देखते थे। धीरे-धीरे टेलीविजन सेवाओं का विस्तार हुआ और 1 अप्रैल, 1976 को दूरदर्शन को आकाशवाणी से अलग विभाग का दर्जा मिला। भारतीय टेलीविजन इतिहास में अगला बड़ा परिवर्तन 15 अगस्त, 1982 को आया, जब रंगीन प्रसारण के साथ राष्ट्रीय कार्यक्रम की शुरुआत हुई। उसी वर्ष नवंबर में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों ने रंगीन टेलीविजन की लोकप्रियता को नया विस्तार दिया। आगे चलकर 'हम लोग', 'बुनियाद', 'रामायण', 'महाभारत' तथा अनेक धारावाहिकों ने टेलीविजन को भारतीय परिवारों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया।


7. कंप्यूटर: 1956 में कोलकाता से शुरू हुई भारत की डिजिटल गणना यात्रा

भारत में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल कंप्यूटिंग के आरंभिक इतिहास में 1956 का विशेष महत्व है। इस वर्ष कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान में ब्रिटेन से आयातित एचईसी-2एम डिजिटल कंप्यूटर स्थापित किया गया। संस्थान के संस्थापक प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस के नेतृत्व में सांख्यिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा राष्ट्रीय योजना निर्माण को आधुनिक गणनात्मक तकनीकों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा था। उस समय कंप्यूटर आज की तरह मेज पर रखी जाने वाली छोटी मशीन नहीं, बल्कि बड़े आकार का जटिल इलेक्ट्रॉनिक उपकरण था, जिसके संचालन के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों और विशेष वातावरण की आवश्यकता होती थी। इसका उपयोग वैज्ञानिक गणनाओं, सांख्यिकीय विश्लेषण, रक्षा संबंधी गणनाओं तथा अन्य जटिल समस्याओं के समाधान में हुआ। 1958 में संस्थान को सोवियत संघ से यूराल कंप्यूटर भी प्राप्त हुआ। भारतीय वैज्ञानिकों ने आगे चलकर स्वदेशी कंप्यूटर विकसित करने की दिशा में कार्य किया, जिसमें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इन प्रारंभिक प्रयासों ने देश में कंप्यूटर विज्ञान, सॉफ्टवेयर विकास, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की बुनियाद तैयार की।


8. मोबाइल फोन: 31 जुलाई, 1995 को हुई भारत की ऐतिहासिक मोबाइल कॉल

भारत में वाणिज्यिक मोबाइल दूरसंचार के इतिहास में 31 जुलाई, 1995 एक ऐतिहासिक तारीख है। उस दिन पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु और केंद्रीय दूरसंचार मंत्री सुखराम के बीच भारत की शुरुआती सार्वजनिक सेलुलर फोन कॉलों में से एक बहुचर्चित कॉल हुई थी। यह बातचीत कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग और नई दिल्ली के संचार भवन के बीच मोदी टेल्स्ट्रा नेटवर्क पर की गई। मोदी समूह और ऑस्ट्रेलिया की टेल्स्ट्रा कंपनी के संयुक्त उपक्रम ने कोलकाता में मोबाइल सेवा प्रारंभ की थी। इस ऐतिहासिक अवसर पर नोकिया के उपकरणों का इस्तेमाल हुआ था। शुरुआती मोबाइल फोन आकार में बड़े, वजन में भारी और बहुत महँगे थे। कॉल करने और कॉल प्राप्त करने, दोनों पर शुल्क लग सकता था और दरें सेवा तथा समय के अनुसार काफी ऊँची थीं। इसलिए मोबाइल फोन शुरुआत में उद्योगपतियों, वरिष्ठ अधिकारियों, व्यापारियों और उच्च आय वर्ग के लोगों की पहुँच में अधिक था। बाद के वर्षों में निजी दूरसंचार कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा, प्रीपेड सेवाओं, सस्ती कॉल दरों और कम कीमत वाले हैंडसेटों ने इस तकनीक को जनसाधारण तक पहुँचा दिया। मोबाइल फोन ने केवल बातचीत का तरीका नहीं बदला, बल्कि आगे चलकर बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और डिजिटल सेवाओं के विस्तार का सबसे बड़ा माध्यम भी बन गया।


9. पेजर: नब्बे के दशक में तत्काल संदेश पाने का नया साधन

भारत में पेजर सेवाओं का व्यावसायिक विस्तार मुख्यतः 1990 के दशक के मध्य में हुआ। मोबाइल फोन के आम होने से पहले पेजर उन लोगों के लिए बेहद उपयोगी उपकरण माना जाता था, जिन्हें कार्यालय या घर से बाहर रहने के दौरान तुरंत संदेश प्राप्त करने की आवश्यकता पड़ती थी। यह एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण था, जिसे कमर की बेल्ट या जेब में रखा जा सकता था। संदेश आने पर इसमें बीप की आवाज सुनाई देती थी और मॉडल के अनुसार नंबर या छोटा लिखित संदेश दिखाई देता था। भारत में मोटोरोला और फिलिप्स जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के उपकरण प्रचलित हुए। डॉक्टर, पत्रकार, शेयर दलाल, कॉर्पोरेट अधिकारी और आपातकालीन सेवाओं से जुड़े लोग इसका उपयोग करते थे। सामान्यतः संदेश भेजने वाले को किसी ऑपरेटर या निर्धारित नंबर के माध्यम से संदेश दर्ज कराना पड़ता था। पेजर केवल संदेश प्राप्त करने का साधन था, इसलिए जवाब देने के लिए अलग से टेलीफोन करना पड़ता था। जैसे-जैसे मोबाइल फोन सस्ते हुए और एसएमएस तथा बाद में इंटरनेट आधारित संदेश सेवाएँ लोकप्रिय हुईं, पेजर की सामान्य व्यावसायिक उपयोगिता लगभग समाप्त हो गई। फिर भी यह मोबाइल संचार क्रांति से ठीक पहले के भारतीय शहरी जीवन का एक महत्वपूर्ण तकनीकी पड़ाव था।


10. टाइपराइटर: सरकारी कार्यालयों से भारतीय लेखन संस्कृति तक पहुँची मशीन

भारत में टाइपराइटर का उपयोग उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में फैलने लगा। व्यावसायिक टाइपराइटर तकनीक के विकास के बाद रेमिंगटन जैसी विदेशी कंपनियों की मशीनें भारतीय बाजार में पहुँचीं। ब्रिटिश प्रशासन के कार्यालयों, रेलवे विभाग, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, न्यायालयों और सरकारी अभिलेखागारों में लिखित दस्तावेजों की बढ़ती आवश्यकता ने इन मशीनों की माँग बढ़ाई।




इससे पहले अधिकांश सरकारी अभिलेख, पत्र और कानूनी दस्तावेज हाथ से लिखे जाते थे। टाइपराइटर ने दस्तावेज तैयार करने की गति बढ़ाई और लिखावट में एकरूपता लाने में सहायता की। धीरे-धीरे प्रशिक्षित टाइपिस्ट का पेशा विकसित हुआ और टाइपिंग की दक्षता सरकारी तथा निजी नौकरियों के लिए उपयोगी योग्यता बन गई। भारतीय भाषाओं में टाइपिंग की सुविधा विकसित होने के साथ इस मशीन का महत्व और बढ़ा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजनीतिक पत्राचार, घोषणापत्र और संगठनात्मक दस्तावेज तैयार करने में भी टाइपराइटर उपयोगी रहा। स्वतंत्रता के बाद गोदरेज ने 1950 के दशक में स्वदेशी टाइपराइटर निर्माण को महत्वपूर्ण गति दी। कंप्यूटर और प्रिंटर के व्यापक प्रसार से पहले तक टाइपराइटर भारतीय कार्यालयी व्यवस्था और व्यावसायिक शिक्षा की पहचान बना रहा।