दीपक जलाने के पीछे छिपे रहस्य: घी, तिल और सरसों के तेल का महत्व
दीपक जलाने के महत्व
Diya Jalane Ke Fayde Kya Hai | Sarson Tel Ghee DiyaJalane Ka Mahatva | Newstrack Special Hindi
Diya Jalane Ke Fayde Kya Hai | Sarson Tel Ghee DiyaJalane Ka Mahatva | Newstrack Special Hindiदीपक जलाने के लाभ: भारत में पूजा की परंपराओं में दीपक का एक महत्वपूर्ण स्थान है। चाहे वह घर में रोजाना की पूजा हो, मंदिर की आरती, नवरात्र का अखंड ज्योति, दीपावली का लक्ष्मी पूजन या कार्तिक मास का दीपदान, हर जगह दीपक का उपयोग होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि घी, तिल का तेल और सरसों का तेल का उपयोग क्यों किया जाता है?
दीपक जलाने का धार्मिक महत्व
उत्तर भारत में शनि, हनुमान और भैरव की पूजा में सरसों के तेल का दीपक जलाना आम है। वहीं, दक्षिण भारत में तिल के तेल से दीप जलाने की परंपरा है, जबकि केरल में नारियल का तेल भी उपयोग होता है। सामान्य पूजा में घी के दीपक को विशेष महत्व दिया जाता है।
इन परंपराओं के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ कृषि और स्थानीय उपलब्धता का भी योगदान है। सभी हिंदू धर्मग्रंथ तिल के तेल को घी से श्रेष्ठ नहीं मानते। महाभारत में घी के दीपक को सर्वोत्तम बताया गया है, जबकि अग्नि पुराण और स्कंद पुराण में तिल के तेल का उल्लेख मिलता है।
दीपक जलाने का धार्मिक अर्थ
भारतीय परंपरा में प्रकाश को ज्ञान और शुभता का प्रतीक माना जाता है। अंधकार को अज्ञान से जोड़ने का भाव उपनिषदों में भी मिलता है।
बृहदारण्यक उपनिषद की एक प्रसिद्ध प्रार्थना है: “असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।” इसका अर्थ है कि हमें असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
तिल के तेल का महत्व
तिल का धार्मिक महत्व केवल दीपक तक सीमित नहीं है। भारतीय परंपरा में तिल का उपयोग स्नान, दान, हवन, तर्पण और श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों में भी होता है। काले तिल का संबंध पितृकर्म से जोड़ा जाता है।
तिल भारत की प्राचीन तिलहनी फसलों में से एक है। तिल का तेल भोजन, मालिश और रोशनी के लिए उपयोग होता था। धार्मिक अनुष्ठानों में तिल के महत्व के कारण इससे जलने वाले दीपक को भी विशेष स्थान मिला है।
अग्नि पुराण में तिल के तेल का उल्लेख
अग्नि पुराण के अध्याय 188 में तिल के तेल के धार्मिक महत्व का उल्लेख मिलता है। इसके आठवें श्लोक में तिल से स्नान, तिल से हवन, तिल के मोदक का नैवेद्य, तिल के तेल का दीपक और तिलोदक देने की विधि बताई गई है।
श्लोक में कहा गया है: “तिलैः स्नानन्तिलैर्होमो नैवेद्यन्तिलमोदकं। दीपश्च तिलतैलेन तथा देयं तिलोदकम्॥”
महाभारत में घी के दीपक का महत्व
महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म और युधिष्ठिर के संवाद में दीपदान की महिमा बताई गई है। इस प्रसंग में घी से जलने वाले दीपक को सर्वोत्तम स्थान दिया गया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग पूजा और अनुष्ठानों के अनुसार सामग्री का महत्व बताया गया है।
घी के दीपक का शुभ महत्व
भारतीय धार्मिक परंपरा में शुद्ध घी को पवित्रता और शुभता से जोड़ा जाता है। सामान्य देवपूजा, आरती और कई धार्मिक संस्कारों में इसका व्यापक उपयोग होता है।
घी की धार्मिक प्रतिष्ठा का एक कारण वैदिक यज्ञों में घृत आहुति का महत्व भी है। हालांकि यज्ञ में घी की आहुति देना और दीपक में घी जलाना दो अलग अनुष्ठान हैं।
सरसों के तेल का उपयोग
उत्तर भारत में सरसों के तेल का दीपक खासतौर पर शनि देव, हनुमान और कालभैरव की पूजा से जुड़ा है। शनिवार को शनि मंदिरों में सरसों के तेल का दीपक जलाने की परंपरा है।
हालांकि ये संबंध मुख्य रूप से क्षेत्रीय धार्मिक परंपराओं पर आधारित हैं।
हनुमान और भैरव पूजा में तेल का महत्व
हनुमान पूजा में सिंदूर और तेल से जुड़ी परंपराएँ उत्तर भारत के अनेक मंदिरों में दिखाई देती हैं।
कुछ परंपराओं में हनुमान जी के सामने घी का दीपक भी जलाया जाता है।
दक्षिण भारत में तिल और नारियल का तेल
दक्षिण भारत में तिल का तेल भोजन, मालिश और धार्मिक अनुष्ठानों में लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है।
केरल के अनेक मंदिरों में नारियल के तेल का भी महत्वपूर्ण स्थान है।
दीपक जलाने की दिशा और बत्ती की संख्या
अलग-अलग पूजा-पद्धतियों में दीपक की दिशा, बत्ती की संख्या और पात्र के आकार को लेकर अलग नियम मिलते हैं।
ये नियम संप्रदाय और स्थानीय परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं।
दीपदान की परंपरा का व्यापक अर्थ
भारत में दीपदान की परंपरा केवल देवमूर्तियों के सामने दीपक जलाने तक सीमित नहीं है।
महाभारत में अंधकार वाले स्थानों पर दीपदान की प्रशंसा की गई है।
घी, तिल और सरसों के तेल का महत्व
भारतीय धार्मिक परंपरा में घी, तिल और सरसों के तेल की अपनी-अपनी जगह है।
इसलिए किसी एक तेल को हर पूजा के लिए सबसे श्रेष्ठ बताना सही नहीं होगा।