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दीप नारायण नायक: कैसे एक शिक्षक ने झुग्गियों में शिक्षा की रोशनी फैलाई?

दीप नारायण नायक, जिन्हें 'रास्ते के मास्टरजी' के नाम से जाना जाता है, ने पश्चिम बंगाल की झुग्गियों में शिक्षा का एक नया अध्याय लिखा है। कोरोना महामारी के दौरान, जब बच्चे पढ़ाई से वंचित हो गए थे, उन्होंने गलियों को क्लासरूम में बदल दिया। न केवल उन्होंने बच्चों को पढ़ाया, बल्कि उनके लिए भोजन का भी इंतजाम किया। जानें उनके संघर्ष और समर्पण की कहानी, जिसने उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
 

दीप नारायण नायक की जीवनी

The Street Teacher Deep Narayan Nayak Biography 

The Street Teacher Deep Narayan Nayak Biography

दीप नारायण नायक की जीवनी: पश्चिम बंगाल के आसनसोल का औद्योगिक क्षेत्र अपने कोयला खदानों और धुएं के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के किनारे पर कुछ बेहद पिछड़ी और आदिवासी बस्तियाँ हैं। इन बस्तियों में रहने वाले परिवारों के लिए हर सुबह केवल पेट भरने की कोशिश होती है। यहाँ के बच्चे या तो कोयला चुनने लगते हैं या छोटे-मोटे कामों में मजदूरी करने लगते हैं। ऐसे माहौल में, जहाँ शिक्षा एक सपना थी, एक व्यक्ति ने इन बस्तियों की किस्मत बदलने का संकल्प लिया। आज उन्हें 'रास्ते के मास्टरजी' के नाम से जाना जाता है। उनका नाम दीप नारायण नायक है। वे एक साधारण सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं, लेकिन उनकी शिक्षण की भूमिका स्कूल की चार दीवारों तक सीमित नहीं है। उन्होंने शिक्षा को स्कूल से बाहर निकालकर सीधे गरीबों के दरवाजे तक पहुँचाया है।


कोरोना काल में संघर्ष

दीप नारायण के इस अद्वितीय मिशन के पीछे एक दर्दनाक संघर्ष की कहानी है। 2020 में जब कोरोना महामारी के कारण देशभर में लॉकडाउन लगा, तब सरकार ने पढ़ाई जारी रखने के लिए 'ऑनलाइन क्लास' का विकल्प चुना। अमीर और मध्यम वर्ग के बच्चे स्मार्टफोन पर पढ़ाई करने लगे। लेकिन दीप नारायण ने देखा कि उनकी आदिवासी बस्ती के गरीब बच्चों के पास दो वक्त का राशन नहीं था, स्मार्टफोन और इंटरनेट तो बहुत दूर की बात थी। इन बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई। लड़के फिर से कोयला खदानों की ओर लौट गए और लड़कियाँ घर के कामों में उलझ गईं। दीप नारायण को यह देखकर गहरा सदमा लगा। उन्हें लगा कि सालों की मेहनत से इन बच्चों में जो पढ़ाई की आदत डाली गई थी, वह कुछ ही महीनों में खत्म हो जाएगी। ये बच्चे हमेशा के लिए बाल श्रम और अपराध की दलदल में फंस जाएंगे। वे घर पर बैठकर हाथ पर हाथ धरे नहीं रह सके।


गलियों को क्लासरूम में बदलना

दीप नारायण ने एक ऐसा रास्ता चुना, जिसके बारे में किसी नीति निर्माता ने नहीं सोचा था। उन्होंने गाँव की तंग गलियों को अपना क्लासरूम बना लिया। उनके पास न तो ब्लैकबोर्ड खरीदने के पैसे थे और न ही बेंच-कुर्सी का इंतजाम था। दीप नारायण ने झुग्गियों की कच्ची मिट्टी की दीवारों पर काले रंग से चौकोर डिब्बे बना दिए। वे दीवारें ही ब्लैकबोर्ड बन गईं। वे रोज़ शाम को चाक और डस्टर लेकर इन बस्तियों में पहुँच जाते थे। बच्चे ज़मीन पर बोरी बिछाकर या सीधे मिट्टी पर बैठकर पढ़ने लगे। शुरुआत में यह काम आसान नहीं था। समाज के कुछ रूढ़िवादी लोगों ने उनका विरोध किया। लोग कहते थे कि "महामारी के दौरान यह शिक्षक हमारे बच्चों को बीमारी बांटने आ रहा है"। प्रशासन की तरफ से भी शुरुआत में कोई सहयोग नहीं मिला। लेकिन दीप नारायण ने हार नहीं मानी। वे बच्चों को सोशल डिस्टेंसिंग सिखाते, उन्हें सैनिटाइज़र देते और खुले आसमान के नीचे पढ़ाते रहे।


शिक्षा के साथ भोजन का इंतजाम

यह संघर्ष केवल क ख ग सिखाने तक सीमित नहीं था। दीप नारायण ने महसूस किया कि भूखे पेट पढ़ाई नहीं हो सकती। इन गरीब बच्चों के माता-पिता लॉकडाउन में बेरोजगार हो गए थे। दीप नारायण ने अपनी जेब से पैसे खर्च करके बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन और दूध का इंतजाम करना शुरू किया। उन्होंने एक और क्रांतिकारी कदम उठाया। वे सिर्फ बच्चों को नहीं पढ़ाते थे। उन्होंने देखा कि बच्चों की माताओं को बैंक के काम या राशन कार्ड के लिए अंगूठा लगाना पड़ता था। उन्होंने शाम की क्लास में उन अनपढ़ महिलाओं को भी शामिल कर लिया। आज उस बस्ती की महिलाएं अपने हस्ताक्षर खुद करती हैं। धीरे-धीरे यह 'स्ट्रीट क्लासरूम' मॉडल इतना लोकप्रिय हुआ कि लॉकडाउन हटने के बाद भी यह बदस्तूर जारी है। उनके इस अद्भुत जज्बे के लिए उन्हें वैश्विक स्तर पर 'ग्लोबल टीचर प्राइज़' के टॉप 10 दावेदारों में शामिल किया गया। दीप नारायण नायक का यह संघर्ष साबित करता है कि एक सच्चा शिक्षक कभी संसाधनों की कमी का रोना नहीं रोता, वह खुद एक रास्ता बन जाता है।