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जादव पायेंग: असम के 'फॉरेस्ट मैन' की अद्भुत कहानी

जादव पायेंग, जिन्हें 'फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जाना जाता है, ने असम के बंजर टापू पर 40 वर्षों में एक घना जंगल तैयार किया है। उनकी प्रेरणादायक यात्रा की शुरुआत एक बाढ़ से हुई थी, जिसने उन्हें जीवों की रक्षा के लिए संघर्ष करने पर मजबूर किया। जानें कैसे उन्होंने अकेले ही इस अद्भुत कार्य को संभव बनाया और आज उनका जंगल एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र बन चुका है।
 

जादव पायेंग की जीवनी

Padma Shri Forest Man of India Jadav Payeng Biography

Padma Shri Forest Man of India Jadav Payeng Biography

जादव पायेंग की जीवनी: असम के जोरहाट जिले में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी अपनी खूबसूरती के साथ-साथ विनाशकारी भी है। हर साल, मानसून के दौरान, यह नदी अपना मार्ग बदलती है और बड़े भूभाग को बंजर रेतीले टापुओं में तब्दील कर देती है। लेकिन आज, एक वीरान टापू पर एक घना जंगल खड़ा है, जिसे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं। यह चमत्कार किसी सरकारी प्रयास का परिणाम नहीं है, बल्कि इसे संभव बनाया है एक साधारण चरवाहे जादव पायेंग ने, जिन्हें 'फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जाना जाता है। इस विशाल जंगल की हर पत्ती के पीछे जादव के 40 वर्षों का संघर्ष और प्रकृति के प्रति उनका असीम प्रेम छिपा है।


बाढ़ ने बदल दी जादव की जिंदगी

इस अद्भुत यात्रा की शुरुआत 1979 में हुई, जब जादव की उम्र केवल 16 वर्ष थी। उस वर्ष ब्रह्मपुत्र नदी में एक भयंकर बाढ़ आई। जब बाढ़ का पानी घटा, तो नदी के किनारे एक दिल दहला देने वाला दृश्य सामने आया। सैकड़ों सांप और अन्य जीव तपती रेत पर तड़पते हुए मरे हुए थे। जादव ने इस दृश्य को देखकर रोना शुरू कर दिया और बुजुर्गों से पूछा कि इन जीवों को कैसे बचाया जा सकता है। सभी ने कहा कि वहाँ कुछ नहीं उग सकता। लेकिन जादव ने हार नहीं मानी और ठान लिया कि वह उस बंजर भूमि को फिर से जीवन देंगे।


अकेले शुरू किया अभियान

जादव ने समाज की परवाह किए बिना उस बंजर टापू पर पौधे लगाना शुरू किया। पहले कुछ साल बेहद कठिन थे। उस टापू पर न तो उपजाऊ मिट्टी थी और न ही पानी की व्यवस्था। जादव अपने घर से पानी लाकर पौधों को सींचते थे। उन्होंने एक अनोखा तरीका अपनाया, जिसमें उन्होंने लाल चींटियों और केंचुओं को लाकर रेत में छोड़ दिया ताकि मिट्टी उपजाऊ हो सके। गाँव के लोग उन्हें पागल समझते थे और मजाक उड़ाते थे।


40 वर्षों की तपस्या

जादव पिछले 40 वर्षों से हर दिन उस टापू पर जाते हैं। आज उनके प्रयासों का परिणाम यह है कि वह बंजर भूमि 1,360 एकड़ के घने जंगल में बदल चुकी है, जिसे 'मोलाई फॉरेस्ट' कहा जाता है। इस जंगल में रॉयल बंगाल टाइगर, भारतीय गैंडे, तेंदुए और हाथियों का झुंड रहता है। भारत सरकार ने जादव को 'पद्म श्री' से सम्मानित किया है। जादव आज भी एक साधारण झोपड़ी में रहते हैं, और उनका जीवन यह संदेश देता है कि एक अकेला व्यक्ति भी प्रकृति को हरा-भरा कर सकता है।