क्या है विक्रम संवत? जानें दीवाली और नए साल का गहरा संबंध
विक्रम संवत का परिचय
Diwali Vikram Samvat History | Vikram Samvat Calculation | Vikram Samvat 2083
Diwali Vikram Samvat History | Vikram Samvat Calculation | Vikram Samvat 2083विक्रम संवत का इतिहास: भारत में समय की गणना के लिए अंग्रेजी कैलेंडर के अलावा कई पारंपरिक संवत भी प्रचलित हैं। आपने पंचांग, मंदिरों के कैलेंडर, धार्मिक आयोजनों या पुराने दस्तावेजों में विक्रम संवत 2082, 2083 जैसी तारीखें देखी होंगी। लेकिन संवत क्या है? इसकी गणना अंग्रेजी वर्ष से अलग क्यों होती है? और दीवाली पर नए साल का मनाने का संवत से क्या संबंध है?
दिलचस्प बात यह है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में संवत का नया साल एक ही दिन नहीं शुरू होता। कहीं इसकी शुरुआत चैत्र महीने से होती है, तो गुजरात में दीवाली के अगले दिन से। इसे समझने के लिए संवत की गणना, इतिहास और भारतीय पंचांग की परंपरा को जानना आवश्यक है।
संवत का अर्थ
संवत या संवत्सर भारतीय समय-गणना की एक पारंपरिक प्रणाली है। सरल शब्दों में, यह वर्ष गिनने का एक तरीका है। जैसे अंग्रेजी कैलेंडर में वर्ष 2026, 2027 या 2028 होते हैं, वैसे ही भारतीय परंपरा में विक्रम संवत 2083 या शक संवत 1948 जैसे वर्ष होते हैं।
संवत की शुरुआत किसी विशेष ऐतिहासिक घटना, राजा के शासनकाल या परंपरागत काल-गणना को आधार बनाकर होती है। इसे संवत का युगारंभ (Epoch) कहा जाता है। विभिन्न संवतों के युगारंभ अलग-अलग होते हैं, इसलिए एक ही तारीख को अलग-अलग संवत में भिन्न वर्ष संख्या मिलती है।
भारत में कई संवत प्रचलित हैं, लेकिन विक्रम संवत और शक संवत प्रमुख हैं। विक्रम संवत का उपयोग उत्तर और पश्चिम भारत में धार्मिक तिथियों और पंचांगों में व्यापक रूप से होता है, जबकि शक संवत भारत के राष्ट्रीय कैलेंडर का आधार है।
विक्रम संवत की शुरुआत
विक्रम संवत की शुरुआत परंपरागत रूप से 57 ईसा पूर्व (57 BCE) मानी जाती है। इसका नाम उज्जैन के राजा विक्रमादित्य से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त करने के बाद इस संवत की शुरुआत की थी। हालांकि, इस कथा के सभी ऐतिहासिक विवरणों को पूरी तरह प्रमाणित नहीं माना जाता।
इतिहासकारों के सामने इस संवत की शुरुआत को लेकर कुछ सवाल भी हैं। प्राचीन अभिलेखों में इस काल-गणना के लिए पहले 'कृत', 'मालव' या केवल 'संवत' जैसे नाम मिलते हैं। 'विक्रम' नाम से इस युग का स्पष्ट उल्लेख बाद के समय में दिखाई देता है। इसलिए 57 ईसा पूर्व से इस संवत की गणना का संबंध माना जाता है, लेकिन इसे सीधे राजा विक्रमादित्य द्वारा उसी समय शुरू किया गया था, यह ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह निश्चित नहीं है।
संवत की गणना
विक्रम संवत की गणना अंग्रेजी कैलेंडर यानी ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 57 वर्ष आगे चलती है। इसका मतलब है कि अंग्रेजी वर्ष में 57 जोड़ने पर आमतौर पर विक्रम संवत का वर्ष मिल जाता है। हालांकि, दोनों कैलेंडरों का नया साल अलग-अलग समय पर शुरू होता है, इसलिए जनवरी से मार्च या अप्रैल तक कुछ तारीखों पर अंतर 56 वर्ष का भी हो सकता है।
उदाहरण के लिए, मार्च 2026 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के बाद उत्तर भारत में विक्रम संवत 2083 शुरू हुआ। इससे पहले, मार्च 2026 के शुरुआती दिनों में विक्रम संवत 2082 ही चल रहा था।
इसे इस तरह समझ सकते हैं:
विक्रम संवत = अंग्रेजी वर्ष + 57
यह गणना विक्रम संवत का नया साल शुरू होने के बाद लागू होती है। नया साल शुरू होने से पहले संबंधित अंग्रेजी वर्ष के लिए अंतर सामान्यतः 56 का रहता है।
चंद्रमा और सूर्य के आधार पर संवत की गणना
विक्रम संवत की परंपरागत गणना चंद्र-सौर (Lunisolar) पद्धति पर आधारित है। इसका मतलब है कि इसमें चंद्रमा की गति के साथ सूर्य की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाता है। चंद्रमा की पृथ्वी के चारों ओर गति के आधार पर तिथियां और महीने तय किए जाते हैं। एक चंद्र मास में दो पक्ष होते हैं। शुक्ल पक्ष अमावस्या के बाद शुरू होकर पूर्णिमा तक जाता है, जबकि कृष्ण पक्ष पूर्णिमा के बाद शुरू होकर अमावस्या तक पहुंचता है।
एक चंद्र वर्ष में सामान्यतः लगभग 354 दिन होते हैं, जबकि पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 365 दिन लगते हैं। यदि कैलेंडर केवल चंद्रमा के आधार पर चलता रहे, तो त्योहार धीरे-धीरे मौसमों से आगे-पीछे होने लगेंगे।
विक्रम संवत का नया साल
भारत में विक्रम संवत की शुरुआत अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराओं के अनुसार होती है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में नया संवत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। इसी दिन गुड़ी पड़वा और उगादी जैसे नववर्ष पर्व भी मनाए जाते हैं।
लेकिन गुजरात में विक्रम संवत का नया साल दीवाली के अगले दिन, यानी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। इसे कार्तिकादि संवत कहा जाता है। गुजरात में इसे बेस्टु वरस या गुजराती नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसलिए यदि कोई पूछे कि विक्रम संवत का नया साल कब शुरू होता है, तो उसका जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि किस क्षेत्र की परंपरा की बात हो रही है।
दीवाली और संवत का संबंध
दीवाली का संवत से संबंध विशेष रूप से गुजरात और पश्चिम भारत की कुछ व्यापारिक परंपराओं में दिखाई देता है। यहां दीवाली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को नए वर्ष की शुरुआत माना जाता है। इसी कारण इसे गुजराती नववर्ष भी कहा जाता है।
दीवाली के समय व्यापारी समुदाय में पुराने हिसाब-किताब को व्यवस्थित करके नए बही-खाते शुरू करने की परंपरा है। इसे चोपड़ा पूजन या मुहूर्त पूजन कहा जाता है। नए बही-खातों में नए संवत का वर्ष लिखा जाता है और नए कारोबारी साल की शुरुआत की जाती है। यह परंपरा केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापार, परिवार और सामाजिक जीवन में भी नए आरंभ का प्रतीक बन गई है।
विक्रम संवत और शक संवत में अंतर
विक्रम संवत और शक संवत दोनों भारतीय काल-गणना की महत्वपूर्ण प्रणालियां हैं, लेकिन इनके शुरुआती वर्ष अलग हैं।
विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसा पूर्व मानी जाती है और इसका पारंपरिक संबंध राजा विक्रमादित्य से जोड़ा जाता है। दूसरी ओर, शक संवत की शुरुआत 78 ईस्वी (CE) से मानी जाती है। इसे शालिवाहन शक संवत भी कहा जाता है।
संवत का महत्व
संवत केवल साल बताने का तरीका नहीं है। भारतीय पंचांग में संवत का उपयोग महीने, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, योग और करण जैसी समय संबंधी जानकारियों के लिए भी किया जाता है।
इस तरह संवत केवल तारीख या साल गिनने की व्यवस्था नहीं, बल्कि भारतीय खगोल-विज्ञान, पंचांग, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक जीवन से जुड़ी समय की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है।