क्या है E-Ink टैबलेट की खासियत? जानें इसकी तकनीक और फायदे
E-Ink टैबलेट: एक नई तकनीक
E-Ink Tablet E Ink Display Paper Like Screen | Newstrack Latest Hindi News | Breaking News
E-Ink Tablet E Ink Display Paper Like Screen | Newstrack Latest Hindi News | Breaking NewsE-Ink टैबलेट: क्या आपको याद है बचपन में आपके पास एक स्लेट होती थी जिस पर चुंबकीय पेन से लिखा जाता था? इसे आमतौर पर मैग्ना डूडल कहा जाता था। इसमें छोटे-छोटे कैप्सूल होते थे, जिनमें रंगीन चूरा होता था। जब आप स्लाइडर खींचते थे, तो सब मिट जाता था। मजेदार बात यह है कि इसे बिजली की जरूरत नहीं होती थी। लिखा हुआ महीनों तक वैसा ही रहता था।
ई-इंक स्क्रीन भी इसी सिद्धांत पर काम करती है, लेकिन इसमें चुंबक की जगह बिजली का उपयोग होता है और पेन की जगह लाखों सूक्ष्म पिक्सल होते हैं। यही कारण है कि यह मोबाइल या टैबलेट की चमकती स्क्रीन से अलग, कागज़ जैसी दिखती है।
साधारण स्क्रीन की रोशनी का प्रभाव
साधारण स्क्रीन आँखों में रोशनी क्यों फेंकती है?
साधारण स्क्रीन की संरचना को समझने के लिए, फ़ोन, लैपटॉप और अधिकांश टैबलेट में LCD या OLED पैनल होते हैं, जो खुद रोशनी उत्पन्न करते हैं। LCD में पीछे एक बैकलाइट होती है, जबकि OLED में हर पिक्सल खुद चमकता है। इन दोनों स्थितियों में रोशनी सीधे आपकी आँखों में आती है, जैसे किसी बल्ब को देखना।
ई-इंक की संरचना
भीतर क्या है: स्याही के सूक्ष्म कैप्सूल
ई-इंक स्क्रीन को माइक्रोस्कोप से देखने पर अनगिनत छोटे पारदर्शी कैप्सूल दिखाई देते हैं, जिनकी चौड़ाई इंसानी बाल के बराबर होती है। हर कैप्सूल में एक तरल भरा होता है, जिसमें सफेद और काले रंग के कण होते हैं। सफेद कणों पर धनात्मक और काले कणों पर ऋणात्मक आवेश होता है।
ग्रे रंग का निर्माण
भूरे और ग्रे रंग कैसे बनते हैं?
ग्रे शेड्स को वोल्टेज की ताकत और उसके समय को बदलकर बनाया जाता है। थोड़े समय के लिए हल्का वोल्टेज देने पर कुछ सफेद कण ऊपर आते हैं और कुछ काले रहते हैं, जिससे ग्रे रंग बनता है। ई-इंक पैनल आमतौर पर 16 स्तर के ग्रे दिखाते हैं।
बिजली की खपत
बिजली सिर्फ़ बदलते समय ख़र्च होती है
दिलचस्प बात यह है कि कैप्सूल में कणों को स्थिर रखने के लिए बिजली की आवश्यकता नहीं होती। एक बार कण अपनी जगह पर पहुँच जाएँ, तो तरल की चिपचिपाहट उन्हें वहीं रोकती है। इसलिए ई-इंक केवल तब बिजली लेती है जब पन्ना पलटा जाता है।
कागज़ जैसी अनुभव
कागज़ जैसी दिखने का रहस्य
ई-इंक का अनुभव कागज़ जैसा होता है क्योंकि यह रोशनी को परावर्तित करती है। इसकी सतह मैट होती है, जो चमकदार प्रतिबिंब नहीं बनाती। इसके अलावा, पैनल फ़्लिकर-मुक्त होता है, जिससे आँखों पर कम दबाव पड़ता है।
क्या यह आँखों के लिए बेहतर है?
क्या यह सचमुच आँखों के लिए बेहतर है?
ई-इंक पर पढ़ना कई लोगों को कम थकाने वाला लगता है, लेकिन यह कहना कि यह आँखों को नुकसान से बचाती है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। आँखों की थकान का एक बड़ा कारण यह भी है कि हम स्क्रीन पर देखते समय पलकें कम झपकाते हैं।
ई-इंक की सीमाएँ
इस तकनीक की कमियाँ भी हैं
ई-इंक की रिफ्रेश रेट LCD से धीमी होती है, जिससे वीडियो या तेज़ स्क्रॉलिंग पर यह अच्छी नहीं लगती। इसके अलावा, कुछ पुराने मॉडल में कॉन्ट्रास्ट कमज़ोर होता है।
रंगीन ई-इंक की चुनौतियाँ
रंगीन ई-इंक: पूरी कहानी का सबसे कठिन अध्याय
रंगीन ई-इंक पैनल में काले-सफेद कैप्सूल के ऊपर रंगीन फ़िल्टर लगाना एक चुनौती थी। इससे रंग फीके दिखते हैं। एक और तरीका है कि हर कैप्सूल में चार रंगीन कण भरे जाएँ, जिससे रंग गाढ़े आते हैं, लेकिन पन्ना बदलने में समय लगता है।
ई-इंक की उत्पत्ति
यह तकनीक आई कहाँ से?
ई-इंक की कहानी 1990 के दशक में शुरू हुई, जब MIT में जोसेफ़ जैकबसन ने इलेक्ट्रॉनिक स्याही की कल्पना की। 1997 में E Ink कंपनी की स्थापना हुई। पहला व्यावसायिक ई-इंक पाठक 2004 में आया, लेकिन असली क्रांति 2007 में किंडल के लॉन्च के साथ हुई।
ई-इंक का उपयोग
तो कौन ख़रीदे, और क्या उम्मीद रखे?
ई-इंक टैबलेट किताबें पढ़ने और नोट्स लिखने के लिए बेहतरीन हैं, लेकिन इन्हें फ़ोन या लैपटॉप का विकल्प नहीं समझना चाहिए। यह एक विशेषज्ञ उपकरण है, जो कुछ कार्यों में उत्कृष्ट है।