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क्या खो गईं चिट्ठियाँ? एक कविता में छिपा है भावनाओं का संसार

इस कविता में चिट्ठियों की खोई हुई दुनिया का जिक्र किया गया है, जहां भावनाएँ और यादें समाहित होती थीं। यह लेख हमें याद दिलाता है कि कैसे डिजिटल युग ने हमारी संवेदनाओं को प्रभावित किया है। क्या हम सच में अपनी यादों को खो रहे हैं? जानें इस लेख में।
 

चिट्ठियाँ: एक भावनात्मक यात्रा

Chitthiyan Poem (Image Credit-Social Media)

Chitthiyan Poem

चिट्ठियाँ

वो चिट्ठियाँ खो गईं, जिनमें भावनाओं का समंदर छिपा होता था, जो हमेशा कुशलता की कामना से शुरू होती थीं और बड़ों के चरण स्पर्श पर समाप्त होती थीं।

इन चिट्ठियों के बीच में जीवन की कहानियाँ होती थीं।

नन्हे मेहमान के आगमन की सूचना,

माँ की बीमारी का दर्द,

और पैसे भेजने की विनती।

फसलों के खराब होने की चिंता भी इनमें समाई होती थी।

कितना कुछ समेटा जाता था एक

नीले कागज में,

जिसे युवा प्रेमिका अपने सीने से लगाती,

और अकेले में आँसू बहाती।

ये चिट्ठियाँ माँ की उम्मीद, पिता का सहारा,

बच्चों का भविष्य और गाँव का मान थीं।

डाकिया चिट्ठी लाएगा, कोई उसे पढ़कर सुनाएगा,

देख-देख कर चिट्ठी को कई बार छूकर,

अनपढ़ भी उसके एहसासों को समझ लेते थे।!

अब तो स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता है,

और अक्सर दिल को तोड़ता है।

मोबाइल का स्पेस भर जाए तो,

सब कुछ दो मिनट में डिलीट हो जाता है।

सब कुछ सिमट गया है 6 इंच की स्क्रीन में,

जैसे मकान फ्लैटों में सिमट गए हैं,

जज्बात मैसेजों में सिमट गए हैं,

चूल्हे गैसों में सिमट गए हैं,

और इंसान पैसों में सिमट गए हैं।

(साभार सोशल मीडिया।)