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क्या आप जानते हैं हिंदी में कितने विदेशी शब्द हैं? जानें फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी का प्रभाव!

क्या आप जानते हैं कि हिंदी में कितने विदेशी शब्द शामिल हैं? इस लेख में हम फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी के प्रभाव का विश्लेषण करेंगे। जानें कि कैसे ये भाषाएँ हिंदी की शब्द-संपदा को समृद्ध करती हैं और क्या 'शुद्ध हिंदी' का कोई अस्तित्व है। इस विषय पर गहराई से जानकारी प्राप्त करें और हिंदी की जड़ों और विकास को समझें।
 

हिंदी में विदेशी शब्दों की पहचान

How Many Foreign Words Are in Hindi | Persian and Arabic Influence on Hindi | Newstrack Hindi

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हिंदी में विदेशी शब्द: हम दिनभर जिस भाषा का उपयोग करते हैं, उसमें कितने शब्द वास्तव में हिंदी के हैं? यह सवाल सीधा है, लेकिन उत्तर हैरान करने वाला। हम 'किताब' पढ़ते हैं, 'कुर्सी' पर बैठते हैं, 'दरवाज़ा' खोलते हैं, 'बाज़ार' जाते हैं, 'दफ़्तर' पहुँचते हैं और 'ख़बर' सुनते हैं। इनमें 'किताब', 'क़ानून' और 'ख़बर' जैसे शब्द अरबी से हैं, जबकि 'दरवाज़ा', 'बाज़ार' और 'दफ़्तर' फ़ारसी से आए हैं। 'अलमारी', 'बाल्टी' और 'चाबी' पुर्तगाली से हैं। 'तोप', 'बेगम' और 'तमगा' तुर्की से संबंधित हैं। 'स्कूल', 'स्टेशन', 'टिकट' और 'डॉक्टर' अंग्रेज़ी से आए हैं।


इनमें से कई शब्द हिंदी में इस कदर घुल-मिल गए हैं कि इन्हें हटाने पर बातचीत अस्वाभाविक लगने लगेगी। लेकिन हिंदी की पहचान केवल इन उधार लिए गए शब्दों से नहीं बनी। इसकी मूल व्याकरण संरचना, अधिकांश बुनियादी क्रियाएँ और सामान्य बोलचाल के कई शब्द भारतीय आर्यभाषाओं के ऐतिहासिक विकास से आए हैं। इसलिए हिंदी को केवल संस्कृत से बनी भाषा कहना अधूरा है और इसे फ़ारसी, अरबी या तुर्की का मिश्रण बताना भी गलत है। हिंदी भारतीय आर्यभाषा है, जिसकी शब्द-संपदा सदियों के व्यापार, शासन, साहित्य और सांस्कृतिक संपर्क से समृद्ध हुई है।


हिंदी में विदेशी शब्दों की संख्या

इसका कोई निश्चित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। विभिन्न शब्दकोश और शोध अलग-अलग सामग्री को गिनते हैं। कहीं केवल मूल शब्द शामिल होते हैं, तो कहीं उनके व्युत्पन्न रूप, साहित्यिक शब्द और पुराने अप्रचलित प्रयोग भी।


भारत सरकार के राजभाषा विभाग और सी-डैक के ऑनलाइन 'हिंदी शब्द-सिंधु' में सात लाख से अधिक शब्दों और प्रविष्टियों का उल्लेख है। लेकिन यह संख्या स्वतंत्र और रोज़मर्रा के शब्दों की नहीं है। इससे यह तय नहीं किया जा सकता कि हिंदी में कितने प्रतिशत शब्द फ़ारसी, अरबी या अंग्रेज़ी से आए हैं। फिर भी कुछ शोध इस भाषाई संपर्क का आकार समझने में मदद करते हैं।


फ़ारसी और अरबी के शब्दों का अध्ययन

2008 में भाषाविद् एग्निएश्का कुच्केविच-फ्रांश की पुस्तक 'Perso-Arabic Loanwords in Hindustani' प्रकाशित हुई। इसमें हिंदुस्तानी की साझा शब्द-संपदा में फ़ारसी और अरबी मूल की लगभग 5,500 प्रविष्टियाँ संकलित की गईं। इसमें हिंदी और उर्दू दोनों की शब्द-संपदा को देखा गया है। हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं कि आज हिंदी बोलने वाला हर व्यक्ति रोज़ाना इन सभी शब्दों का उपयोग करता है। इनमें साहित्यिक, ऐतिहासिक और कम प्रचलित शब्द भी शामिल हैं। स्पष्ट है कि हिंदी-उर्दू में फ़ारसी और अरबी का प्रभाव कुछ दर्जन शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि हजारों प्रविष्टियों में फैला हुआ है।


पुराने शब्दकोशों में अरबी-फ़ारसी शब्द

उन्नीसवीं शताब्दी के उर्दू शब्दकोश फ़रहंग-ए-आसफ़िया में लगभग 7,584 अरबी और 6,041 फ़ारसी मूल की प्रविष्टियाँ दर्ज होने का उल्लेख मिलता है। दोनों को मिलाकर संख्या 13,625 होती है।


तुर्की मूल के शब्द फ़ारसी और अरबी की तुलना में कम हैं, लेकिन उनका इतिहास दिलचस्प है। भारत आने वाले अनेक तुर्की मूल के शासक और सैनिक प्रशासन तथा साहित्य में फ़ारसी का उपयोग करते थे। इस कारण कुछ तुर्की शब्द पहले फ़ारसी में पहुँचे और फिर भारतीय भाषाओं में शामिल हुए।


अंग्रेज़ी के शब्दों की गिनती

अंग्रेज़ी का प्रभाव औपनिवेशिक शासन, आधुनिक शिक्षा, रेलवे, कानून, विज्ञान, चिकित्सा और उद्योग के साथ बढ़ा। आज इंटरनेट, मोबाइल और सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। स्कूल, बस, ट्रेन, टिकट, स्टेशन, डॉक्टर और बैंक जैसे शब्द हिंदी में स्थायी रूप से स्थापित हो चुके हैं। लेकिन किसी बातचीत में एक बार अंग्रेज़ी का तकनीकी शब्द बोल देने से वह हिंदी की स्थायी शब्द-संपदा का हिस्सा नहीं बन जाता। इसलिए अंग्रेज़ी से आए शब्दों की कोई एक निश्चित संख्या बताना मुश्किल है। इसके लिए शब्दकोशों के साथ अखबारों, पुस्तकों, फिल्मों, सोशल मीडिया और वास्तविक बातचीत का भी अध्ययन करना पड़ता है।


हिंदी की जड़ें और विकास

हिंदी की उत्पत्ति भारतीय आर्यभाषाओं के लंबे विकासक्रम से हुई है। संस्कृत इस इतिहास की महत्त्वपूर्ण प्राचीन भाषा है, लेकिन आधुनिक हिंदी को सीधे शास्त्रीय संस्कृत का बदला हुआ रूप कहना पूरी प्रक्रिया को सरल बना देना होगा। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से हिंदी का विकास पुरानी भारतीय आर्यभाषाओं, प्राकृतों, अपभ्रंश और क्षेत्रीय बोलियों के कई चरणों से होकर हुआ।


उत्तर भारत में ब्रजभाषा, अवधी, कन्नौजी, बुंदेली और दूसरी भाषाओं-बोलियों की अपनी साहित्यिक परंपराएँ रहीं। आधुनिक मानक हिंदी का आधार मुख्यतः दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की खड़ी बोली बनी। तुलसीदास की प्रमुख काव्यभाषा अवधी थी और सूरदास की काव्य परंपरा ब्रजभाषा से जुड़ी है। आज की मानक हिंदी इनसे अलग खड़ी बोली पर आधारित है। इसलिए हिंदी किसी एक भाषा से सीधे पैदा नहीं हुई। उसका आधुनिक स्वरूप कई सदियों के भाषाई बदलाव और मानकीकरण का परिणाम है।


‘शुद्ध हिंदी’ की परिभाषा

हिंदी के शब्दों को समझने के लिए चार श्रेणियाँ उपयोगी हैं - तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी।


तत्सम वे शब्द हैं जिन्हें हिंदी ने संस्कृत से लगभग मूल रूप में अपनाया है। जैसे अग्नि, जल, सूर्य, पृथ्वी, कर्म, धर्म, ज्ञान और संस्कृति।


तद्भव वे शब्द हैं जो प्राचीन भारतीय आर्यभाषाओं से प्राकृत और अपभ्रंश जैसे चरणों से गुजरते हुए बदलकर आधुनिक हिंदी में पहुँचे हैं।


इसलिए ‘आग’ को ‘अग्नि’ की तुलना में अशुद्ध कहना गलत होगा। आग हिंदी का स्वाभाविक ऐतिहासिक शब्द है। इसी तरह ‘आँख’ को हटाकर केवल ‘नेत्र’ बोलना भाषाई शुद्धता का प्रमाण नहीं है। दोनों हिंदी की शब्द-संपदा का हिस्सा हैं।


फ़ारसी का प्रभाव

मध्यकाल में दिल्ली सल्तनत और बाद के मुगल शासन के दौरान फ़ारसी लंबे समय तक प्रशासन, राजकीय पत्राचार, इतिहासलेखन और साहित्य की प्रमुख भाषा रही। राजस्व, न्यायालय, सैनिक संगठन और सरकारी कार्यालयों में फ़ारसी शब्दों का प्रयोग बढ़ा। इन संस्थाओं से जुड़े भारतीय कर्मचारी भी फ़ारसी सीखते और उसका इस्तेमाल करते थे। धीरे-धीरे प्रशासन की भाषा के शब्द आम बोलचाल में पहुँच गए।


दरवाज़ा, बाज़ार, दफ़्तर, ज़मीन, शहर, दीवार, चश्मा, सब्ज़ी, दोस्त, दुश्मन, ख़ुश, बीमार, शादी और आवाज़ जैसे शब्द हिंदी-उर्दू में इतने सामान्य हो गए कि उनका विदेशी इतिहास अक्सर ध्यान में नहीं आता। फ़ारसी का प्रभाव केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा। उसने घरेलू जीवन, व्यापार, प्रशासन और सामाजिक संबंधों की शब्दावली को भी प्रभावित किया।


घरेलू शब्दों की फ़ारसी यात्रा

'दरवाज़ा' फ़ारसी से आया। 'दीवार' और 'बाज़ार' भी फ़ारसी मूल के हैं। 'सब्ज़ी' का संबंध फ़ारसी के 'सब्ज़' यानी हरे रंग से है। 'ख़ुश', 'दोस्त', 'दुश्मन', 'आवाज़', 'पर्दा' और 'आसमान' जैसे शब्द भी हमारी रोज़मर्रा की भाषा में शामिल हो चुके हैं।


एक सामान्य वाक्य देखिए - 'मेरा दोस्त बाज़ार से सब्ज़ी लेकर आया और दरवाज़े के पास खड़ा हो गया।'


इस वाक्य की व्याकरणिक संरचना हिंदी की है, लेकिन दोस्त, बाज़ार, सब्ज़ी और दरवाज़ा फ़ारसी मूल के शब्द हैं। इससे वाक्य कम हिंदी नहीं हो जाता। यही भाषा के स्वाभाविक विकास का उदाहरण है।


अरबी के शब्दों का हिंदी में प्रवेश

हिंदी-उर्दू में अरबी मूल के अनेक शब्द सीधे अरबी बोलने वालों के माध्यम से नहीं, बल्कि फ़ारसी के रास्ते आए। फ़ारसी में अरबी शब्द पहले से प्रचलित थे। भारत में फ़ारसी के प्रशासनिक और साहित्यिक प्रभाव के साथ वे यहाँ भी फैल गए।


किताब, क़लम, क़ानून, हिसाब, अदालत, इंसाफ़, सवाल, जवाब, ख़बर, तारीख़, दुनिया, इंसान, ज़रूरत, हक़, इल्म, वक़्त और क़ीमत जैसे शब्द अरबी मूल के हैं।


हमारी न्याय और प्रशासन की भाषा

'अदालत ने फैसला सुनाया' - इस छोटे वाक्य में अदालत और फैसला अरबी मूल के शब्द हैं, जबकि 'ने' और 'सुनाया' हिंदी की व्याकरणिक संरचना का हिस्सा हैं। इसी तरह क़ानून, हिसाब, तारीख़, रकम, क़ीमत, हक़, इल्ज़ाम और जुर्म जैसे शब्द हमारी प्रशासनिक तथा न्यायिक भाषा में गहराई से शामिल हैं। हिंदी की पुरानी सरकारी और कानूनी शब्दावली को समझने के लिए संस्कृत के साथ फ़ारसी और अरबी का इतिहास जानना भी जरूरी है।


तुर्की के शब्दों का योगदान

तुर्की भाषाओं का योगदान अपेक्षाकृत सीमित है, लेकिन कुछ शब्द बेहद परिचित हैं।


'तोप' का संबंध तुर्की के 'टोप' से जोड़ा जाता है। 'बेग' और 'बेगम' तुर्की मूल के सम्मानसूचक शब्दों से संबंधित हैं। 'पाशा' तुर्की-उस्मानी प्रशासनिक परंपरा से आया। 'तमगा' का संबंध तुर्की-मंगोल भाषाई परंपरा से जोड़ा जाता है। कुछ शब्द फ़ारसी के रास्ते भारतीय भाषाओं में पहुँचे। इसलिए समान दिखाई देने वाले शब्दों को बिना ऐतिहासिक प्रमाण के तुर्की मूल का मान लेना ठीक नहीं है।


क्या ‘उर्दू’ शब्द भी तुर्की से आया है?

हाँ। 'उर्दू' की व्युत्पत्ति तुर्की भाषाओं के 'ओरदु' या 'ओरदा' से जुड़ी है, जिसका संबंध सेना या सैनिक शिविर से रहा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उर्दू भाषा तुर्की से पैदा हुई। उर्दू और आधुनिक मानक हिंदी, दोनों का व्याकरणिक आधार भारतीय आर्यभाषाई परंपरा से संबंधित है। उनकी मूल वाक्य संरचना, सर्वनाम और अधिकांश सामान्य क्रियाएँ साझा हैं।


पुर्तगाली का योगदान

हिंदी में विदेशी शब्दों की चर्चा अक्सर अंग्रेज़ी, फ़ारसी और अरबी तक सीमित रहती है। लेकिन पुर्तगाली भाषा का योगदान भी उल्लेखनीय है। भारत में पुर्तगाली संपर्क अंग्रेज़ी औपनिवेशिक शासन से पहले शुरू हो गया था। समुद्री व्यापार और तटीय बस्तियों के माध्यम से अनेक शब्द भारतीय भाषाओं में आए।


'अलमारी' का संबंध पुर्तगाली armário से है। 'बाल्टी' पुर्तगाली balde से और 'चाबी' chave से संबंधित है। 'अनानास' का शब्द-इतिहास भी पुर्तगाली ananás से जुड़ता है, जिसकी और पुरानी जड़ दक्षिण अमेरिका की स्वदेशी भाषाओं तक पहुँचती है। 'पादरी' का संबंध पुर्तगाली padre से है और 'गिरजा' का पुर्तगाली igreja से।


‘शुद्ध हिंदी’ की परिभाषा

'शुद्ध हिंदी' शब्द दो अलग अर्थों में इस्तेमाल होता है। पहला अर्थ व्याकरण, वर्तनी और भाषा की स्वाभाविक शुद्धता से जुड़ा है। वाक्य सही हो, शब्द उचित अर्थ में इस्तेमाल हों और अभिव्यक्ति स्पष्ट हो। दूसरा अर्थ शब्दों की उत्पत्ति से जुड़ा है। कुछ लोग ऐसी हिंदी को शुद्ध मानते हैं जिसमें संस्कृत मूल के शब्द अधिक हों और फ़ारसी, अरबी या अंग्रेज़ी के शब्द कम। लेकिन भाषाविज्ञान में ये दोनों बातें अलग हैं। कोई वाक्य संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी गलत या अस्वाभाविक हो सकता है। दूसरी ओर फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी मूल के शब्दों से बना वाक्य भी पूरी तरह व्याकरण-सम्मत हिंदी हो सकता है।


आधुनिक मानक हिंदी का विकास

आधुनिक मानक हिंदी के विकास में उन्नीसवीं शताब्दी की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। उस दौर में खड़ी बोली पर आधारित हिंदी और उर्दू की साहित्यिक तथा प्रशासनिक पहचान अलग-अलग मानकीकृत रूपों में विकसित होने लगी। हिंदी में संस्कृत से तत्सम शब्द ग्रहण करने की प्रवृत्ति बढ़ी, जबकि उच्च साहित्यिक उर्दू में फ़ारसी और अरबी शब्दावली का प्रयोग अधिक हुआ। इस बदलाव में औपनिवेशिक शिक्षा, न्यायालयों की भाषा, लिपि, मुद्रण उद्योग, साहित्यिक संस्थाओं और सामाजिक पहचान की भूमिका थी। दोनों की व्याकरणिक संरचना इसके बावजूद बहुत हद तक साझा बनी रही।


किताब और पुस्तक में अंतर

'किताब' अरबी मूल का शब्द है, जबकि 'पुस्तक' संस्कृत मूल का। 'कलम' अरबी से आया और 'लेखनी' संस्कृत से। 'क़ानून' अरबी मूल का है, जबकि 'विधि' और 'नियम' संस्कृत से संबंधित हैं। 'ख़बर' अरबी मूल की है, जबकि 'समाचार' संस्कृत से आया। 'सवाल' अरबी से और 'प्रश्न' संस्कृत से जुड़ा है। 'जवाब' अरबी मूल का है और 'उत्तर' संस्कृत का।


इसी तरह 'बाज़ार' फ़ारसी का है, जबकि 'द्वार' संस्कृत का। 'दोस्त' फ़ारसी से आया और 'मित्र' संस्कृत से। 'ख़ुशी' फ़ारसी से संबंधित है और 'आनंद' संस्कृत से।


हिंदी ने दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपने ढंग से ढाला

भाषाई संपर्क की सबसे दिलचस्प प्रक्रिया तब दिखाई देती है, जब एक भाषा का शब्द दूसरी भाषा के व्याकरण और शब्द-निर्माण के नियमों में ढल जाता है।


'दुकान' से दुकानदार और दुकानदारी जैसे रूप बने। 'समझदार', 'ईमानदार', 'ज़िम्मेदार' और 'ख़बरदार' में फ़ारसी के '-दार' तत्व की भूमिका है। 'बेनाम', 'बेकार' और 'बेइज्ज़त' में फ़ारसी का 'बे-' दिखाई देता है।


अंग्रेज़ी शब्दों के साथ भी यही होता है। हम कहते हैं - 'फ़ाइलें रख दीं', 'टिकटों की जाँच हुई', 'डॉक्टरों ने सलाह दी' और 'मीटिंग कर ली'।


हिंदी और उर्दू के बीच का अंतर

हिंदी और उर्दू को लेकर दो अतिवादी दावे किए जाते हैं, एक कि दोनों बिल्कुल अलग भाषाएँ हैं और दूसरा कि इनमें कोई अंतर ही नहीं है। वास्तविकता इन दोनों के बीच है। दोनों की बोलचाल की एक बड़ी साझा पृष्ठभूमि है, जिसे हिंदुस्तानी कहा जाता है। सामान्य बातचीत में दोनों के वक्ता अक्सर एक-दूसरे को आसानी से समझ लेते हैं।


लेकिन औपचारिक साहित्य और प्रशासनिक शब्दावली में अंतर बढ़ सकता है। हिंदी सामान्यतः देवनागरी में लिखी जाती है, जबकि उर्दू फ़ारसी-अरबी आधारित नस्तालीक़ लिपि में। दोनों की साहित्यिक परंपराएँ भी अलग विकसित हुई हैं। इसके बावजूद उर्दू की मूल व्याकरण अरबी या फ़ारसी की नहीं, बल्कि भारतीय आर्यभाषाई परंपरा की है।


क्या विदेशी शब्दों को हटाने से हिंदी अधिक शुद्ध हो जाएगी?

किसी लेखक को विशेष उद्देश्य से संस्कृतनिष्ठ हिंदी लिखनी हो तो वह ऐसा कर सकता है। इसी तरह कोई कवि फ़ारसी और अरबी शब्दों से अपनी अभिव्यक्ति को समृद्ध कर सकता है। लेकिन भाषा की गुणवत्ता को इस आधार पर मापना कि उसमें कितने विदेशी मूल के शब्द हैं, उचित नहीं है।


अंग्रेज़ी में फ्रांसीसी, लैटिन और यूनानी से बड़ी संख्या में शब्द आए हैं, फिर भी वह अंग्रेज़ी ही है। जापानी में चीनी मूल के अनेक शब्द हैं और फ़ारसी में अरबी शब्दों का व्यापक प्रभाव है। यह भाषाओं के स्वाभाविक विकास का हिस्सा है।


हिंदी ने दूसरी भाषाओं को भी शब्द दिए

भाषाओं के बीच शब्दों का आदान-प्रदान एकतरफा नहीं होता। अंग्रेज़ी ने भी भारतीय भाषाओं से अनेक शब्द ग्रहण किए हैं। जंगल, बंगला, पायजामा, लूट, ठग, गुरु, योग, चटनी, चारपाई और डाकू जैसे शब्द अंग्रेज़ी में भारतीय भाषाओं के माध्यम से पहुँचे। हालाँकि इन सभी का मूल आधुनिक मानक हिंदी नहीं है। कुछ संस्कृत, क्षेत्रीय भाषाओं, फ़ारसी या दूसरे स्रोतों से आए और फिर भारतीय भाषाओं के रास्ते अंग्रेज़ी में पहुँचे।


क्या अंग्रेज़ी का प्रभाव हिंदी को बदल देगा?

अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव से हिंदी की शब्द-संपदा और बोलने की शैली बदल रही है। खासकर शहरी बातचीत, शिक्षा, तकनीक और डिजिटल संचार में अंग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है।


लेकिन इससे हिंदी के समाप्त हो जाने का निष्कर्ष नहीं निकलता। किसी भाषा का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि कितने लोग उसे सीखते हैं, उसमें लिखते-पढ़ते हैं, नए विचार व्यक्त करते हैं और अगली पीढ़ी तक पहुँचाते हैं।


हिंदी की पहचान

हिंदी की शब्द-संपदा का इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेज है। उसकी मूल संरचना भारतीय आर्यभाषाओं के विकास से बनी। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश ने उसे ऐतिहासिक आधार दिया।


हिंदी का इतिहास शब्दों को बाहर रखने का नहीं, बल्कि अलग-अलग स्रोतों से आए शब्दों को अपनी व्याकरण और बोलचाल में ढालने का भी इतिहास है। जिसे हम आज सहज हिंदी कहते हैं, उसमें असंख्य पीढ़ियों की आवाज़ें, संस्कृतियाँ और अनुभव मौजूद हैं। शायद किसी जीवित भाषा की सबसे बड़ी ताकत भी यही है - वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहते हुए दुनिया से संवाद करना जानती है।