☰
×

क्या आप जानते हैं दुनिया का सबसे धीमा वैज्ञानिक प्रयोग क्या है?

पिच ड्रॉप प्रयोग, जो ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी में लगभग एक सदी से चल रहा है, ठोस और तरल के बीच की सीमाओं को चुनौती देता है। यह प्रयोग दिखाता है कि कैसे एक पदार्थ, जो सामान्य तापमान पर ठोस लगता है, वास्तव में बहुत धीमी गति से बह सकता है। इस प्रयोग का इतिहास और इसके पीछे की वैज्ञानिक प्रक्रिया जानने के लिए पढ़ें।
 

पिच ड्रॉप प्रयोग: एक अद्भुत वैज्ञानिक यात्रा

Pitch Drop Experiment in Hindi

पिच ड्रॉप प्रयोग: अगर कोई कहे कि दुनिया का सबसे लंबा वैज्ञानिक प्रयोग किसी विशाल मशीन या अंतरिक्ष यान में नहीं, बल्कि एक साधारण कांच की कीप में चल रहा है, तो शायद आपको विश्वास करना मुश्किल होगा। ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी में यह प्रयोग पिछले लगभग 100 वर्षों से चल रहा है। इसे पिच ड्रॉप प्रयोग कहा जाता है, जिसका उद्देश्य यह दिखाना है कि जो पदार्थ कमरे के तापमान पर ठोस लगता है, वह वास्तव में बहुत धीमी गति से बहने वाला द्रव हो सकता है.


पिच का रहस्य

इस प्रयोग की सबसे दिलचस्प बात इसकी धीमी गति नहीं, बल्कि इसका इतिहास है। 1930 में जब कीप का मुंह खोला गया, तब से अब तक इसकी बूंदों को गिरने में कई साल लगे। पहली बूंद को गिरने में करीब आठ साल लगे। इसके बाद कुछ बूंदें सात से नौ साल के अंतर पर गिरीं। सातवीं बूंद 1988 में गिरी, लेकिन उसके बाद कहानी और भी अजीब हो गई। आठवीं और नौवीं बूंद को नीचे पहुंचने में करीब 13 साल लगे। और जब वैज्ञानिकों ने सोचा कि अब आधुनिक कैमरों की मदद से इस ऐतिहासिक घटना को जरूर रिकॉर्ड कर लिया जाएगा, तब भी प्रयोग ने उन्हें चौंका दिया.


पिच की विशेषताएँ

पिच, जिसे 'टार' से प्राप्त किया जाता है, एक अत्यंत गाढ़ा पदार्थ है। पुराने समय में इसका उपयोग नावों को पानी से बचाने के लिए किया जाता था। कमरे के सामान्य तापमान पर यह इतना कठोर दिखाई देता है कि हथौड़े से मारने पर कांच की तरह टूट सकता है। इसे छूने पर यह किसी बहते हुए तरल जैसा नहीं लगता.


पिच का बहना

यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के भौतिकी संग्रहालय के अनुसार, 1927 में प्रोफेसर थॉमस पार्नेल ने पिच को गर्म करके एक कांच की कीप में डाला। कीप के नीचे का रास्ता बंद था। पिच को करीब तीन साल तक वहीं ठंडा और स्थिर रहने दिया गया। 1930 में कीप के नीचे का बंद हिस्सा काट दिया गया। इसके बाद पिच बाहर निकलने लगी, लेकिन इतनी धीमी गति से कि एक बूंद बनने और नीचे पहुंचने में वर्षों लग गए.


पिच की श्यानता

किसी द्रव के बहने की क्षमता को उसकी श्यानता (Viscosity) कहा जाता है। पानी की श्यानता कम है, इसलिए वह तेजी से बहता है। पिच की श्यानता इतनी अधिक है कि सामान्य नजर से उसका बहना लगभग दिखाई नहीं देता।


बूंदों का गिरना

1930 में कीप का रास्ता खोलने के बाद पहली बूंद दिसंबर 1938 में नीचे पहुंची। इसके बाद बूंदें कई वर्षों के अंतर से गिरती रहीं। 1979 में छठी बूंद गिरी और 1988 में सातवीं बूंद नीचे पहुंची.


कैमरा और बूंदों का गिरना

2000 में वैज्ञानिकों ने कैमरा लगाया था ताकि वे बूंद को गिरते हुए देख सकें। लेकिन बिजली कटने के कारण कैमरा रिकॉर्ड नहीं कर पाया और बूंद गिर गई।


नौवीं बूंद का रहस्य

नौवीं बूंद करीब 13 साल तक बनती रही। वैज्ञानिकों ने उम्मीद की थी कि यह बूंद कैमरे के सामने गिरेगी, लेकिन यह भी एक रहस्य बन गई।


महत्वपूर्णता

यह प्रयोग पदार्थों के व्यवहार को समझने का एक अद्भुत तरीका है। यह हमें दिखाता है कि ठोस दिखने वाले पदार्थ भी समय के साथ बह सकते हैं।


दुनिया का सबसे लंबा प्रयोग

पिच ड्रॉप प्रयोग को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने 2002 में दुनिया का सबसे लंबा प्रयोग माना।