×

कौन हैं 'बीज माता' राहीबाई सोमा पोपेरे? जानें उनकी प्रेरणादायक कहानी

राहीबाई सोमा पोपेरे, जिन्हें 'बीज माता' के नाम से जाना जाता है, ने अपने संघर्ष और दृढ़ संकल्प से पारंपरिक बीजों की रक्षा की है। एक गरीब आदिवासी महिला के रूप में, उन्होंने हाइब्रिड बीजों के दुष्प्रभावों का सामना किया और अपने गाँव में 'मदर सीड बैंक' की स्थापना की। उनकी कहानी न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह कृषि में पारंपरिक ज्ञान के महत्व को भी उजागर करती है। जानें कैसे उन्होंने हजारों किसानों को रासायनिक खाद से दूर रहने के लिए प्रेरित किया।
 

राहीबाई सोमा पोपेरे का परिचय

Why Uttar Pradesh Decides Prime Minister India

Why Uttar Pradesh Decides Prime Minister India

राहीबाई सोमा पोपेरे की जीवनी: "बीज केवल फसल नहीं देते, बल्कि ये हमारी मिट्टी का इतिहास और स्वास्थ्य भी निर्धारित करते हैं। विदेशी हाइब्रिड बीजों ने हमारी भूमि और स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाया है।" महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कोंभलने गाँव में, एक बुजुर्ग महिला अपने खेतों की ओर बढ़ती हैं। उनके हाथ में आधुनिक उपकरण नहीं हैं, बल्कि मिट्टी के बर्तनों में रखे कुछ साधारण बीज हैं। ये बीज इस देश की मिट्टी की प्राचीन विरासत और मानव स्वास्थ्य को बचाने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं। आज पूरी दुनिया उन्हें 'बीज माता' के नाम से जानती है। लेकिन इस सफलता के पीछे एक अनपढ़ आदिवासी महिला की संघर्ष भरी कहानी है।


कठिनाइयों का सामना

राहीबाई का जन्म महादेव कोली जनजाति के एक गरीब परिवार में हुआ। उनका बचपन इतना कठिन था कि उन्होंने कभी स्कूल नहीं देखा। मात्र सात साल की उम्र में उनकी माँ का निधन हो गया। नौ भाई-बहनों में राहीबाई पांचवें नंबर पर थीं। उनके हाथों में हमेशा पशुओं का चारा और हंसिया होता था। 12 साल की उम्र में उनका विवाह एक अनपढ़ किसान से हुआ। ससुराल में उन्हें कोई सम्मान नहीं मिला और वे केवल एक खेतिहर मजदूर बनकर रह गईं।


हाइब्रिड बीजों का प्रभाव

1990 के दशक के अंत में गाँव में 'हरित क्रांति' का आगाज़ हुआ। राहीबाई ने भी हाइब्रिड बीजों का उपयोग किया, लेकिन इसके परिणाम भयानक रहे। उनके नाती-पोते और गाँव के बच्चे बीमार रहने लगे। रासायनिक दवाओं का खर्च बढ़ने लगा और राहीबाई ने समझा कि यह बीमारी उन ज़हरीले बीजों के कारण है।


शांत विद्रोह की शुरुआत

राहीबाई ने निर्णय लिया कि वे बाजार से कोई बीज नहीं खरीदेंगी। उन्होंने अपने पूर्वजों के देशी बीजों को खोजने का कार्य शुरू किया। गाँव वाले उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन राहीबाई ने हार नहीं मानी। वे आसपास के गाँवों में जाकर बुजुर्गों से बीज मांगती रहीं।


'मदर सीड बैंक' की स्थापना

उनके प्रयास धीरे-धीरे एक विशाल 'मदर सीड बैंक' में बदल गए। आज उनके पास 122 से अधिक पारंपरिक बीजों का संग्रह है। उन्होंने आदिवासी महिलाओं को एकत्रित किया और उन्हें बीजों के महत्व के बारे में बताया। वे हजारों किसानों को ये बीज मुफ्त में देती हैं, बशर्ते वे रासायनिक खाद का उपयोग न करें। 2020 में उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया, जिससे यह साबित हुआ कि एक अनपढ़ महिला ने कॉर्पोरेट कंपनियों के बीज साम्राज्य को चुनौती दी।