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कौन हैं 'शिवपुत्र' पंडित कुमार गंधर्व? जानिए उनकी अनोखी यात्रा और संगीत में क्रांति

पंडित कुमार गंधर्व, जिन्हें 'शिवपुत्र' के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक अनोखी क्रांति लाने वाले कलाकार हैं। 8 अप्रैल को उनकी जयंती मनाई जाएगी। जानें कैसे उन्होंने बीमारी को मात देकर संगीत में नई दिशा दी और 'धुनुगम राग' की रचना की। उनकी गायकी में भावनाओं की गहराई और प्रयोग की स्वतंत्रता का अद्भुत मेल है।
 

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सितारे




नई दिल्ली, 7 अप्रैल। भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कई महान कलाकारों ने अपनी छाप छोड़ी है। इनमें से कुछ कलाकार भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कला आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। ऐसे ही एक कलाकार हैं पंडित कुमार गंधर्व, जिन्हें 'शिवपुत्र' के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने बीमारी को मात देकर मंच पर वापसी की और संगीत में एक नई दिशा दी।


8 अप्रैल को पंडित कुमार गंधर्व की जयंती मनाई जाएगी। उन्होंने 'धुनुगम राग' की रचना कर भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। उनका मानना था कि राग केवल सुरों का समूह नहीं, बल्कि भावनाओं और जीवन का एक रूप है।


कुमार गंधर्व का जन्म 8 अप्रैल 1924 को कर्नाटक के बेलगाम जिले के सुलेभावी गांव में हुआ। उनका असली नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली था। उनके परिवार में संगीत का माहौल था, जिससे संगीत के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही विकसित हुई। मात्र सात साल की उम्र में उनकी गायकी ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके पिता ने उन्हें अपने गुरु स्वामी वल्लभदास के पास भेजा, जिन्होंने उनकी आवाज सुनते ही कहा, 'यह तो गंधर्व है।' इसी दिन से उन्हें 'कुमार गंधर्व' नाम मिला।


कुमार गंधर्व ने शास्त्रीय संगीत में कई नए प्रयोग किए और लोक धुनों का गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने ऐसे रागों की रचना की जो पहले कभी नहीं सुने गए, जिन्हें 'धुनुगम राग' कहा जाता है। उनका मानना था कि राग को नियमों में बांधने के बजाय उसे भाव और जीवन देना चाहिए। उन्होंने जयपुर, आगरा और ग्वालियर घरानों की विशेषताओं को मिलाकर अपनी अनोखी गायकी शैली विकसित की।


हालांकि, उनकी जिंदगी में कठिनाइयाँ भी आईं। युवावस्था में उन्हें टीबी हो गई, जिससे उनका एक फेफड़ा प्रभावित हुआ। डॉक्टरों ने कहा कि सामान्य तरीके से गाना मुश्किल होगा, लेकिन कुमार गंधर्व ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी सांस लेने की तकनीक में बदलाव किया और गायकी में नए प्रयोग किए। बीमारी के बावजूद, उन्होंने मंच पर वापसी की और अपनी कला को और भी गहरा और संवेदनशील बना दिया।


उनकी गायकी में भावनाओं की गहराई, सुरों की स्पष्टता और प्रयोग की स्वतंत्रता का अद्भुत मेल था। उन्होंने ऋतुसंगीत और बालगंधर्व जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से संगीत को आम लोगों तक पहुँचाया। पंडित कुमार गंधर्व का योगदान भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने वाला रहा। उनकी मेहनत और साहस को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1977 में पद्म भूषण और 1990 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। आज भी उनकी गायकी सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।