क्या आप जानते हैं 'मेरे हमसफर' के इस गाने की दिलचस्प कहानी?
गाने की अनकही कहानी
नई दिल्ली, 12 नवंबर। कुछ गाने ऐसे होते हैं जो समय के साथ भी अपनी छाप छोड़ते हैं। 'मेरे हमसफर' फिल्म का टाइटल सॉन्ग भी ऐसा ही एक गाना है। हिंदी सिनेमा की कहानी बिना गानों के अधूरी लगती है। गाने और संगीत के बिना, फिल्म की रंगत फीकी पड़ जाती है।
कुछ गाने सिर्फ फिल्म से नहीं, बल्कि समय के साथ भी जुड़ जाते हैं, जैसे कि 'किसी राह में, किसी मोड़ पर।' यह गाना दिल से निकला था और शायद यही कारण है कि 55 साल बाद भी इसकी गूंज सुनाई देती है। 'मेरे हमसफर' 13 नवंबर 1970 को रिलीज हुई थी, और इसकी कहानी उतनी ही खूबसूरत है जितनी खुद फिल्म। यह गाना केवल एक कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी आत्मा बन गया।
गीतकार इंदीवर ने 1980 के दशक में एक साक्षात्कार में इस गाने की रचना की कहानी साझा की थी, जो बाद में 'मेलोडी मेकर्स ऑफ हिंदी सिनेमा' नामक किताब में भी शामिल की गई। उन्होंने बताया कि वह पुणे के एक छोटे होटल में थे, जब रात के करीब बारह बजे हल्की बारिश हो रही थी। फिल्म की कहानी उनके मन में चल रही थी, जिसमें दो लोग जिंदगी के मोड़ पर बिछड़ते हैं और फिर किसी राह में मिलते हैं। इसी एहसास में उन्होंने पंक्ति लिखी – 'किसी राह में, किसी मोड़ पर...' और बाकी शब्द अपने आप आ गए।
कहा जाता है कि इस गाने के बोल महज 20 मिनट में तैयार हो गए। अगली सुबह जब उन्होंने यह गाना कल्याणजी-आनंदजी को सुनाया, तो संगीतकार जोड़ी कुछ क्षण के लिए चुप रही और फिर कल्याणजी ने कहा, 'इंदीवर, यह तो दिल की गहराई से निकला है।' उसी दिन धुन बनी और अगले दो दिनों में गाना रिकॉर्ड भी हो गया। उस समय निर्देशक दुलाल गुहा ने अपने असिस्टेंट से कहा था, 'अब फिल्म पूरी हो गई। कहानी को जो एहसास चाहिए था, वह मिल गया।'
'मेरे हमसफर' (1970) के लिए यह गाना केवल एक भावनात्मक टुकड़ा नहीं था, बल्कि पूरी कहानी का प्रतीक बन गया- प्रेम, दूरी और किस्मत की लकीरों का। जब जितेन्द्र और शर्मिला टैगोर पर यह गाना फिल्माया गया, तो कहा जाता है कि शूटिंग के दौरान पूरा सेट कुछ समय के लिए शांत हो गया था। दुलाल गुहा ने बाद में एक फिल्मी पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा था, 'वो सीन हम सबको रोक गया। हमें लगा जैसे किसी ने हमारे अपने बिछड़ने की कहानी हमारे सामने रख दी हो।'
फिल्म की रिलीज के समय यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि रेडियो सिलोन और विविध भारती पर महीनों तक रोज बजता रहा। हालांकि फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ी सफलता नहीं पाई, लेकिन इसे समय के साथ 'क्लासिक' का दर्जा मिला। इसके संवाद, भावनात्मक गहराई और संगीत आज भी उस दौर की सादगी की याद दिलाते हैं।