साधना शिवदासानी: एक्ट्रेस बनने की कहानी और फैशन में क्रांति
साधना शिवदासानी का अद्वितीय सफर
मुंबई, 02 सितंबर (वेब वार्ता)। 1960 के दशक की प्रसिद्ध अभिनेत्री साधना शिवदासानी ने अपने अभिनय और अनोखे स्टाइल से लाखों दिलों पर राज किया। विभाजन के दर्द से लेकर गुमनामी के दिनों तक, उनके जीवन के अनकहे किस्से जानिए।
हिंदी सिनेमा का इतिहास कई महान हस्तियों की कहानियों से भरा हुआ है, जिन्होंने पर्दे पर आते ही एक नया युग शुरू किया। 60 के दशक में जब सिनेमा अपनी पहचान बना रहा था, तब एक ऐसी अभिनेत्री ने कदम रखा जिसने न केवल अभिनय के नए मानक स्थापित किए, बल्कि फैशन की दुनिया को भी बदल दिया। उनका नाम साधना शिवदासानी था। कराची की गलियों से शुरू हुआ उनका सफर मुंबई के चमकते हुए रुपहले पर्दे तक पहुंचा। साधना ने अपनी खूबसूरती, सादगी और दिलकश मुस्कान से दर्शकों के दिलों में एक खास स्थान बनाया।
विभाजन का दर्द और नाम के पीछे छिपा राज
साधना का जन्म 2 सितंबर 1941 को पाकिस्तान के कराची में एक सिंधी परिवार में हुआ। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं। जब देश का बंटवारा हुआ, तो उनका परिवार अपनी पुरानी यादों को छोड़कर मुंबई आ गया। साधना के पिता 1930 के दशक की प्रसिद्ध अभिनेत्री साधना बोस के बड़े प्रशंसक थे, जिसके कारण उन्होंने अपनी बेटी का नाम साधना रखा। आगे चलकर यही नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने वाला बना।
एक रुपये के मेहनताने से करियर की शुरुआत
साधना का अभिनय के प्रति लगाव बहुत कम उम्र में ही विकसित हो गया था। केवल 14 साल की उम्र में उन्होंने राज कपूर की प्रसिद्ध फिल्म ‘श्री 420’ में बैकग्राउंड डांसर के रूप में काम किया। इसके बाद 16 साल की उम्र में उन्हें सिंधी फिल्म ‘अबाना’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिला, जिसके लिए उन्हें केवल 1 रुपये का मेहनताना मिला। शुरुआती दिनों में राज कपूर के साथ काम करते समय कुछ ऐसी घटनाएं हुईं कि उनके रिश्तों में दूरियां आ गईं।
हेयरस्टाइल जो बन गया फैशन स्टेटमेंट
‘अबाना’ फिल्म के रिलीज के बाद एक पत्रिका में साधना की तस्वीर छपी, जिसने उस समय के बड़े प्रोड्यूसर सशाधर मुखर्जी का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने साधना को अपनी फिल्म ‘लव इन शिमला’ से लॉन्च करने का निर्णय लिया। फिल्म के निर्देशक आरके नैय्यर को साधना का माथा थोड़ा बड़ा लगा, इसलिए उन्होंने हॉलीवुड अभिनेत्री ऑड्रे हेपबर्न की तर्ज पर साधना के बालों को आगे से काटकर माथे पर बिखेर दिया। यह नया हेयरस्टाइल इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे ‘साधना कट’ कहा जाने लगा और उस समय की हर लड़की इसे अपनाने लगी।
एक अमर नगमा और रहस्य का जादू
1964 में आई रहस्यमय फिल्म ‘वो कौन थी’ ने भारतीय सिनेमा को एक ऐसा गीत दिया, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। इस फिल्म में लता मंगेशकर द्वारा गाया गया गाना ‘लग जा गले से फिर’ साधना पर फिल्माया गया था। इस गाने की धुन और भावनाएं इतनी गहरी थीं कि इसने लोगों के दिलों पर गहरा असर छोड़ा।
गुमनामी में बीते अंतिम दिन
सफलता की ऊंचाइयों को छूने वाली साधना की व्यक्तिगत जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए। 1995 में उनके पति आरके नैय्यर का निधन हो गया, जिसके बाद वह पूरी तरह अकेली पड़ गईं। जीवन के अंतिम चरण में उन्हें थायराइड की गंभीर बीमारी हो गई, जिसने उनकी आंखों की रोशनी और रूप-रंग पर गहरा असर डाला। उन्होंने खुद को चमक-धमक वाली दुनिया से पूरी तरह अलग कर लिया और मुंबई के एक पुराने किराए के बंगले में अपने अंतिम दिन सादगी और गुमनामी में बिताए।