पवन कल्याण ने संत त्यागराज की जयंती पर दी श्रद्धांजलि, संगीत विरासत को संरक्षित करने की अपील
संत त्यागराज की 259वीं जयंती पर श्रद्धांजलि
हैदराबाद, 4 मई। आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और अभिनेता पवन कल्याण ने संत त्यागराज की 259वीं जयंती के अवसर पर सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने इस महान संगीतकार-संत की संगीत विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
पवन कल्याण ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "संत त्यागराज की 259वीं जयंती पर, मैं भारत के महानतम संगीतकार-संतों में से एक को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। उनके संगीत ने भक्ति को एक शाश्वत आध्यात्मिक मार्ग में बदल दिया और भारत की सांस्कृतिक आत्मा को समृद्ध किया।"
उन्होंने बताया कि संत त्यागराज का जन्म आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले के काकरला गांव में हुआ था, और वे तेलुगु भाषी लोगों के लिए गर्व का प्रतीक हैं। उन्होंने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनकी रचनाएं भक्ति और दार्शनिक गहराई से भरी हुई हैं। संत त्यागराज कर्नाटक संगीत की प्रसिद्ध 'त्रिमूर्ति' में से एक हैं, जिनमें अन्य दो मुथुस्वामी दीक्षितार और श्यामा शास्त्री शामिल हैं।
परंपरा के अनुसार, संत त्यागराज ने लगभग 24,000 कृतियों की रचना की थी, लेकिन वर्तमान में केवल 730 रचनाएं ही उपलब्ध हैं। इनमें से लगभग 400 रचनाएं ही सक्रिय रूप से गाई जाती हैं। पवन कल्याण ने चिंता व्यक्त की कि यह हमारा सामूहिक कर्तव्य है कि इस अमूल्य संगीत विरासत को संरक्षित किया जाए और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए। उनकी प्रसिद्ध रचनाएं जैसे 'जगदानंद कारका', 'एंदारो महानुभावुलु', 'बंटु रीति कोलवु', 'समाजवरगमना' और 'नागुमोमु' आज भी संगीत प्रेमियों को आकर्षित करती हैं।
दिग्गज कलाकारों जैसे एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी, मंगलमपल्ली बालमुरलीकृष्ण, सेम्मंगुडी श्रीनिवास अय्यर और डी. के. पट्टम्मल ने इन रचनाओं को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाया। पवन कल्याण ने चेन्नई और तिरुवैयारु में त्यागराज आराधना के दौरान देखी गई भक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को उतनी ही श्रद्धा से मनाना चाहिए। उन्होंने अन्य तेलुगु संत-कवियों जैसे बाम्मेरा पोथाना और अन्नमाचार्य की विरासत को भी संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
संरक्षण के लिए, पवन कल्याण ने दो महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। पहला, आंध्र प्रदेश में राज्य स्तरीय 'त्यागराज आराधना उत्सव' का आयोजन, जिसमें पूरे भारत और विदेश से संगीतकार, विद्वान और भक्त शामिल हों। दूसरा, संत त्यागराज की पांडुलिपियों, संगीत नोटेशन्स, दुर्लभ रिकॉर्डिंग्स और मौखिक परंपराओं का व्यापक डिजिटलीकरण अभियान। उनका मानना है कि सरकार, सांस्कृतिक संस्थानों और समाज के सामूहिक प्रयासों से ही इस महान संत की विरासत को संरक्षित और आगे बढ़ाया जा सकता है।