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दुर्गा खोटे: भारतीय सिनेमा की पहली फ्रीलांस एक्ट्रेस की प्रेरणादायक कहानी

दुर्गा खोटे, भारतीय सिनेमा की पहली फ्रीलांस एक्ट्रेस, ने अपने करियर में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनके साहसिक कदम ने न केवल उन्हें पहचान दिलाई, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं के लिए भी रास्ता आसान किया। जानें उनके जीवन की प्रेरणादायक कहानी, संघर्ष और उपलब्धियों के बारे में।
 

दुर्गा खोटे का अद्वितीय सफर


मुंबई, 13 जनवरी। हिंदी और मराठी सिनेमा के प्रारंभिक दिनों में महिलाओं के लिए फिल्म उद्योग में कदम रखना आसान नहीं था। उस समय अधिकांश कलाकार किसी एक स्टूडियो या प्रोडक्शन हाउस के साथ लंबे समय तक अनुबंध में बंधे रहते थे। ऐसे में स्वतंत्र रूप से विभिन्न कंपनियों के लिए काम करना एक चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा कार्य माना जाता था।


दुर्गा खोटे ने इस डर को तोड़ते हुए भारतीय सिनेमा की पहली फ्रीलांस अभिनेत्री बनकर यह साबित किया कि महिलाएं भी अपने बलबूते पर सफलता प्राप्त कर सकती हैं। उनके इस साहसिक कदम ने न केवल उन्हें एक अलग पहचान दिलाई, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं के लिए भी रास्ता आसान किया।


दुर्गा खोटे का जन्म 14 जनवरी 1905 को मुंबई में हुआ। वह बचपन से ही पढ़ाई में तेज थीं और उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। उस समय लड़कियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना भी एक चुनौती था, लेकिन दुर्गा की शिक्षा ने उनके भविष्य की नींव रखी।


17 वर्ष की आयु में दुर्गा ने विश्वनाथ खोटे से विवाह किया, जो एक शिक्षित युवा थे। शादी के बाद उनके दो बेटे हुए, लेकिन दुर्भाग्यवश, 26 वर्ष की आयु में उनके पति का निधन हो गया। अपने बच्चों की परवरिश करना दुर्गा के लिए कठिन था, इसलिए उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर आर्थिक रूप से खुद को मजबूत करने का निर्णय लिया।


इस दौरान उन्हें फिल्मों में काम करने का अवसर मिला। उनकी बहन के माध्यम से दुर्गा को 'फरेबी जाल' फिल्म में एक छोटी भूमिका मिली। उस समय समाज में महिलाओं का फिल्मों में काम करना असभ्य माना जाता था, लेकिन दुर्गा ने अपने बच्चों और आत्मनिर्भरता के लिए यह कदम उठाया। उनकी मेहनत और प्रतिभा ने उन्हें लगातार नई भूमिकाओं में लाने का काम किया।


दुर्गा खोटे ने फिल्मों में आने के बाद एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। उन्होंने स्टूडियो की अनुबंध प्रणाली को अस्वीकार कर कई कंपनियों के लिए काम करना शुरू किया। प्रभात फिल्म कंपनी के साथ काम करते हुए उन्होंने न्यू थिएटर, ईस्ट इंडिया फिल्म कंपनी और प्रकाश पिक्चर्स जैसी कंपनियों के लिए भी काम किया। इस कारण उन्हें भारतीय सिनेमा की पहली फ्रीलांस महिला कलाकार माना गया। इस निर्णय ने न केवल उन्हें स्वतंत्रता दी, बल्कि फिल्म उद्योग में महिलाओं की स्थिति को भी बदल दिया।


उनका करियर लगभग 50 वर्षों तक चला, जिसमें उन्होंने हिंदी और मराठी में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनके यादगार किरदारों में 'मुगल-ए-आजम' में जोधा बाई, 'मिर्जा गालिब' में मां का किरदार, 'बॉबी' में दादी और 'भरत मिलाप' जैसी कई हिट फिल्में शामिल हैं। वह केवल अभिनय तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि 1937 में 'साथी' फिल्म का निर्माण और निर्देशन भी किया, जो उस समय की एक दुर्लभ उपलब्धि थी।


दुर्गा खोटे को कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। 1942 और 1943 में उन्हें बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। 1958 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1968 में पद्मश्री और 1983 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। खास बात यह है कि दादा साहेब फाल्के पुरस्कार जीतने वाली चौथी महिला कलाकार दुर्गा खोटे थीं।


जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ी, दुर्गा खोटे ने मां और दादी के किरदार निभाना शुरू किया। इसके अलावा, उन्होंने शॉर्ट फिल्में, डॉक्यूमेंट्री और धारावाहिकों का निर्माण भी किया। दूरदर्शन के प्रसिद्ध शो 'वागले की दुनिया' का निर्माण भी उन्होंने किया। दुर्गा खोटे का निधन 22 सितंबर 1991 को हुआ।