कौन थे सागर सरहदी? जानिए शायरी और सिनेमा के इस दिग्गज की कहानी
सागर सरहदी: एक संवेदनशील शायर और फिल्मकार
मुंबई, 10 मई। “मैं पल दो पल का शायर हूं...” इस पंक्ति को सुनते ही दिल में एक गहरी भावना जाग उठती है। ये शब्द उस व्यक्ति के हैं, जिसने देश के विभाजन की पीड़ा को अपने भीतर महसूस किया। वह थे सागर सरहदी, जिनका असली नाम गंगासागर तलवार था।
सागर सरहदी केवल एक शायर या फिल्म निर्माता नहीं थे, बल्कि एक संवेदनशील इंसान भी थे। उन्होंने विभाजन की पीड़ा को कभी नहीं भुलाया। उनकी रचनाओं में गांव की मिट्टी, दरिया की आवाज और सरहद की पीड़ा का अनुभव स्पष्ट झलकता है।
साल 1933 में 11 मई को अविभाजित भारत के एक छोटे से गांव बाफा (एबाटाबाद) में जन्मे सागर सरहदी ने एक खूबसूरत प्राकृतिक परिवेश में अपना बचपन बिताया। लेकिन, मां की छांव जल्दी ही छिन गई। जब वह केवल 14 वर्ष के थे, तब देश का विभाजन हुआ, जिसने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया।
अपने परिवार के साथ पहले श्रीनगर और फिर दिल्ली के रिफ्यूजी कैंप में पहुंचने के बाद, उन्होंने शरणार्थी जीवन का सामना किया। इस अनुभव ने उनके मन में गहरी टीस पैदा की और उन्होंने अपने नाम को बदलकर गंगासागर तलवार से सागर सरहदी रख लिया।
मुंबई आने के बाद भी उनकी जिंदगी संघर्ष से भरी रही। उन्होंने कई नौकरियों की, लेकिन उनका असली उद्देश्य कहीं और था। उनके अंदर रचनात्मकता का एक खजाना था, जिसे उन्होंने उर्दू नाटकों के माध्यम से व्यक्त किया। ‘शहीद भगत सिंह’, ‘हीर रांझा’, और ‘तनहाई’ जैसे नाटक बेहद लोकप्रिय हुए।
1974 में उन्होंने फिल्म ‘गूंज’ से अपने करियर की शुरुआत की। यश चोपड़ा से मिलने के बाद, उनका करियर नई ऊंचाइयों पर पहुंचा। उन्होंने ‘कभी कभी’ में संवाद और पटकथा लिखी, इसके बाद ‘सिलसिला’, ‘चांदनी’, ‘नूरी’, और ‘बाजार’ जैसी कई सफल फिल्में आईं। 1982 में उन्होंने ‘बाजार’ का निर्देशन भी किया, जिसमें नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल और फारूख शेख जैसे कलाकार थे।
जब राकेश रोशन ने ऋतिक रोशन को लॉन्च करने का निर्णय लिया, तो संवाद लिखने के लिए उन्होंने सागर सरहदी को चुना। फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ के गाने आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। 22 मार्च 2021 को मुंबई में उन्होंने अंतिम सांस ली।