कठपुतली कला का जश्न: विश्व कठपुतली दिवस पर जानें इसकी विविधता और महत्व
विश्व कठपुतली दिवस का महत्व
हर साल 21 मार्च को विश्वभर में प्राचीन कठपुतली कला का जश्न मनाया जाता है, जिसे विश्व कठपुतली दिवस के रूप में जाना जाता है। भारत में, यह कला सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है, जो लकड़ी, चमड़े, कपड़े और रंगों से बनी पुतलियों के माध्यम से कहानियों को जीवंत करती है। यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि नैतिक मूल्यों, लोककथाओं और सामाजिक संदेशों का भी वाहक है।
कठपुतली कला की विविधताएं
भारत में कठपुतली कला की कई शैलियां हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति और परंपराओं को दर्शाती हैं। महाभारत और पाणिनी की अष्टाध्यायी में इस कला का उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने लकड़ी की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाया था।
भारत में मुख्यतः चार प्रकार की कठपुतली शैलियां प्रचलित हैं: धागा वाली, छाया वाली, छड़ वाली और दस्ताने वाली। राजस्थान में भाट या नट कलाकार रंग-बिरंगी पुतलियों को धागों से नचाते हैं, जिनकी कहानियां योद्धाओं और राजाओं की होती हैं।
क्षेत्रीय विशेषताएं
उत्तर प्रदेश में गुलाबो-सिताबो की दस्ताने वाली कठपुतली कला 17वीं शताब्दी से प्रचलित है, जिसमें दो पत्नियों के बीच हास्यपूर्ण संवाद होते हैं। तमिलनाडु में तोलु बोम्मलट्टम और बोम्मलट्टम प्रमुख हैं, जो महाकाव्यों की कहानियों को दर्शाते हैं।
कर्नाटक में तोगालु गोम्बेयटा और यक्षगान गोम्बेयटा प्रसिद्ध हैं, जबकि आंध्र प्रदेश में तोलु बोम्मलता और अन्य शैलियां रामायण-महाभारत के प्रसंगों को दिखाती हैं। ओडिशा में रावण छाया और गोपालिला कुंधेई जैसी शैलियां कृष्ण-राधा की लीलाओं पर केंद्रित हैं।