उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर: ध्रुपद के सच्चे संरक्षक जिनकी आवाज ने विदेशों में भी गूंज उठी
ध्रुपद के महानायक का सफर
उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर ने अपनी जिंदगी को शास्त्रीय गायन की अद्भुत शैली 'ध्रुपद' को समर्पित किया। आज जब ध्रुपद को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त है, तो इसके पीछे डागर परिवार की कई पीढ़ियों की मेहनत है।
8 मई 2013 को जिया फरीदुद्दीन डागर का निधन हुआ। बहुत से लोग नहीं जानते कि उन्होंने ऑस्ट्रिया में लंबे समय तक ध्रुपद की शिक्षा दी। उस समय विदेशों में ध्रुपद का अध्ययन करना अत्यंत दुर्लभ था, लेकिन उनकी आवाज और संगीत की गहराई ने यूरोप के श्रोताओं को भारतीय संगीत की ओर आकर्षित किया।
जिया फरीदुद्दीन डागर का जन्म 15 जून 1932 को राजस्थान के उदयपुर में हुआ। उनके पिता, उस्ताद जियाउद्दीन डागर, उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह के दरबारी संगीतकार थे। घर का माहौल संगीत से भरा हुआ था, और उन्हें बचपन से ही ध्रुपद गायन और वीणा की शिक्षा मिली। कहा जाता है कि उन्होंने छोटी उम्र में ही सुरों की पहचान करना शुरू कर दिया था।
पिता के निधन के बाद, उनके बड़े भाई उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर ने उन्हें आगे की शिक्षा दी। दोनों भाई ध्रुपद संगीत की दुनिया में एक सम्मानित जोड़ी बन गए।
जिया मोहिउद्दीन डागर रुद्र वीणा के महान कलाकार थे, जबकि जिया फरीदुद्दीन डागर अपनी गहरी आवाज के लिए जाने जाते थे। दोनों ने मिलकर ध्रुपद को नई पहचान दी। उस समय शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद की लोकप्रियता कम हो रही थी, लेकिन डागर परिवार ने इसे जीवित रखा। उन्होंने भारत और विदेशों में कई बड़े मंचों पर प्रदर्शन किया।
1980 के दशक में, उन्होंने ऑस्ट्रिया में रहना शुरू किया और वहां ध्रुपद की शिक्षा देने लगे। वे फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों में भी संगीत सिखाते थे। उस समय भारतीय शास्त्रीय संगीत के बहुत कम कलाकार विदेशों में जाकर ऐसी शिक्षा देते थे। कई विदेशी छात्र उनकी गायकी सुनने भारत आने लगे। उनके शिष्य उन्हें केवल गुरु नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते थे।
बाद में, फिल्म निर्देशक मणि कौल ने उनसे अपनी फिल्म के लिए संगीत देने का अनुरोध किया। इस दौरान उनका भोपाल आना-जाना बढ़ा। मध्य प्रदेश सरकार ने ध्रुपद को बढ़ावा देने के लिए भोपाल में ध्रुपद केंद्र की स्थापना की और इसकी जिम्मेदारी उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर को सौंपी। उन्होंने वहां लगभग 25 वर्षों तक छात्रों को संगीत सिखाया। गुंडेचा बंधु, उदय भावलकर और कई अन्य प्रमुख कलाकार उनके शिष्य रहे।
उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर को उनके योगदान के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और टैगोर रत्न शामिल हैं। संगीत की दुनिया में उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। 8 मई 2013 को उनका निधन पनवेल के पास उनके गुरुकुल में हुआ।