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सतिंदर सरताज का दिलचस्प सफर: कैसे एक लड़की के आंसुओं ने दिया उन्हें एक हिट गाना!

सतिंदर सरताज, एक प्रसिद्ध गायक, ने अपने करियर की शुरुआत पंजाब यूनिवर्सिटी में एक लड़की को रोते हुए देखकर की। इस पल ने उन्हें 'कुड़ियों रोया ना करो' गाना लिखने के लिए प्रेरित किया। जानें उनके जीवन की अनोखी कहानी, संगीत में उनकी यात्रा और कैसे उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।
 

सतिंदर सरताज की अनोखी कहानी




मुंबई, 30 अगस्त। गायक सतिंदर सरताज हमेशा चर्चा का विषय बने रहते हैं। उनकी कला में भावनाओं को शब्दों और सुरों में ढालने की अद्भुत क्षमता है। यही कारण है कि उनके कई गाने केवल सुनने के लिए नहीं होते, बल्कि लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। उनके जीवन से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा पंजाब यूनिवर्सिटी के दिनों का है, जब उन्होंने एक लड़की को रोते हुए देखा और इस पल ने उन्हें एक गाना लिखने के लिए प्रेरित किया।


सतिंदर सरताज का असली नाम सतिंदर पाल सिंह है, और उनका जन्म पंजाब के होशियारपुर जिले के बजरावर गांव में हुआ। बचपन से ही उन्हें संगीत की ओर झुकाव था, और गांव में आने वाले लोक कलाकारों की बांसुरी और सारंगी की धुनें उन्हें आकर्षित करती थीं। उन्होंने बाल सभाओं में गाना शुरू किया, और यहीं से संगीत उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया।


बड़े होने पर उन्होंने संगीत की औपचारिक शिक्षा ली। उन्होंने म्यूजिक में ऑनर्स किया और जालंधर से शास्त्रीय संगीत में पांच साल का डिप्लोमा प्राप्त किया। इसके बाद, उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी में म्यूजिक में मास्टर्स और एमफिल किया, और सूफी गायन में पीएचडी की। सूफी कविताओं की गहराई को समझने के लिए उन्होंने फारसी भाषा भी सीखी। बाद में, उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी के म्यूजिक विभाग में लगभग छह साल तक पढ़ाया।


पंजाब यूनिवर्सिटी के दिनों में उनके लेखन की शैली और भी निखर गई। एक बार, यूनिवर्सिटी के एक इवेंट में उन्होंने एक लड़की को रोते हुए देखा, और यह पल उनके मन में गहराई से बस गया। इस भाव को उन्होंने शब्दों में ढाला और 'कुड़ियों रोया ना करो' गाना लिखा। यह किस्सा उन्होंने एक कार्यक्रम में साझा किया था, और यह गाना उनके एक एल्बम का हिस्सा बना, जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया।


कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने कविता लिखना शुरू किया और 'सरताज' नाम को अपना तखल्लुस बनाया। यही नाम बाद में उनकी पहचान बन गया। उनके संगीत में सूफी विचारधारा, पंजाबी लोक रंग और कविता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।


संगीत की दुनिया में उनकी पहचान धीरे-धीरे मजबूत हुई। शुरुआत में उन्होंने छोटे मंचों पर प्रदर्शन किया और बाद में विदेशों में भी पंजाबी श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हो गए। उनका बड़ा ब्रेक 2008 में आया, जब कनाडा के टोरंटो में एक कार्यक्रम के आयोजकों ने इंटरनेट पर उनका गाना सुनकर उन्हें परफॉर्म करने के लिए आमंत्रित किया। इसके बाद उनके अंतरराष्ट्रीय कॉन्सर्ट का सिलसिला बढ़ता गया।


'साईं' गीत उनके करियर में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर रहा। 2010 में रिलीज हुए इस सूफी गीत ने उन्हें हर घर तक पहुंचा दिया। इसके बाद, उनकी पहचान केवल पंजाब तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह दुनियाभर में मशहूर हो गए। 2014 में, उन्होंने लंदन के प्रतिष्ठित रॉयल अल्बर्ट हॉल में भी प्रस्तुति दी, जो उनके करियर की बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।


सरताज को उनके संगीत के लिए कई पुरस्कार भी मिले हैं। 2011 में, उन्हें ब्रिट एशिया टीवी म्यूजिक अवार्ड्स में बेस्ट इंटरनेशनल एक्ट का पुरस्कार मिला। इसके बाद, 2017 में उन्हें बेस्ट सॉन्गराइटर और 2018 में 'उड़ारियां' के लिए म्यूजिक वीडियो ऑफ द ईयर का सम्मान मिला।


संगीत के अलावा, उन्होंने अभिनय में भी कदम रखा। 2017 की फिल्म 'द ब्लैक प्रिंस' में उन्होंने महाराजा दलीप सिंह का किरदार निभाया। इसके बाद, वह 'इक्को मिक्के', 'काली जोट्टा', 'शायर' और अन्य पंजाबी फिल्मों में भी नजर आए।