लीला मजूमदार: बच्चों की कहानियों की जादूगरनी जिनकी रचनाएं आज भी जीवित हैं
लीला मजूमदार का साहित्यिक सफर
नई दिल्ली, 25 फरवरी। बांग्ला साहित्य में कई ऐसे लेखक हुए हैं जिनकी कलम का जादू आज भी कविता और कहानी के रूप में जीवित है। इनमें से एक प्रमुख नाम है लीला मजूमदार, जो बाल साहित्य की जादूगरनी मानी जाती हैं। उन्होंने बच्चों की कहानियों से लेकर वयस्क उपन्यासों तक सभी आयु वर्ग के पाठकों को अपनी रचनाओं से समृद्ध किया।
लीला मजूमदार की रचनाएं न केवल बच्चों के लिए आकर्षक थीं, बल्कि महिलाओं के जीवन, भावनाओं और संघर्षों की सच्ची प्रतिनिधि भी रहीं। उनका जन्म 26 फरवरी 1908 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनके पिता, प्रमदा रंजन रे, प्रसिद्ध लेखक उपेंद्रकिशोर राय चौधरी के छोटे भाई थे। उनका बचपन शिलांग में बीता, और उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा लोरेटो कॉन्वेंट और सेंट जॉन्स डायोसेसेन स्कूल से प्राप्त की, जहां वे हमेशा उच्च अंक लाती थीं।
कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स और मास्टर्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद, उन्होंने दार्जिलिंग के महारानी गर्ल्स स्कूल में शिक्षण कार्य शुरू किया। रवींद्रनाथ टैगोर के आग्रह पर वे शांतिनिकेतन में शामिल हुईं और बाद में आशुतोष कॉलेज और ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया। रेडियो पर उन्होंने 'महिला महल' सीरीज में 'मोनिमाला' नामक किरदार को जीवंत किया, जो एक साधारण बंगाली लड़की की जिंदगी को दर्शाता है।
लीला मजूमदार का साहित्यिक सफर किशोरावस्था में चाचा उपेंद्रकिशोर द्वारा शुरू की गई पत्रिका 'संदेश' में कहानी 'लक्खी छेले' से शुरू हुआ। उनकी पहली बच्चों की किताब 'बैद्यनाथर बोरी' थी, लेकिन 'दिन दुपुरे' ने उन्हें आलोचकों की प्रशंसा दिलाई। उन्होंने 125 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें कहानी संग्रह, उपन्यास, कविताएं, संस्मरण, रसोई की किताबें, अनुवाद और संपादित ग्रंथ शामिल हैं।
लीला मजूमदार की कहानियां रोजमर्रा की जिंदगी की सच्चाइयों को हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत करती थीं, लेकिन उनमें गहराई और संवेदनशीलता भी थी। उन्होंने मजबूत महिला पात्रों का निर्माण किया, जो घरेलू जीवन की जटिलताओं को बखूबी उजागर करते थे। बच्चों के लिए उन्होंने सपनों की दुनिया बनाई, जबकि वयस्क पाठकों को पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक मुद्दों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना 'बक बध पाला' एक हास्य-नाटक है, जिसके लिए उन्हें पुरस्कार भी मिला। उपन्यास 'पाडी पिशिर बोरमी बक्शो' पर सत्यजीत रे फिल्म बनाने की योजना बना चुके थे, जिसे बाद में अरुंधति देवी ने फिल्माया। उन्होंने शेक्सपियर, जोनाथन स्विफ्ट और अर्नेस्ट हेमिंग्वे जैसे लेखकों के कार्यों का बांग्ला में अनुवाद भी किया।