ललिता पवार: बॉलीवुड की 'अत्याचारी सास' का संघर्ष और सफलता की कहानी
ललिता पवार का अद्वितीय सफर
मुंबई, 23 फरवरी। बॉलीवुड में कुछ ऐसे कलाकार होते हैं जिनकी अदाकारी लोगों के दिलों में बस जाती है। ललिता पवार का नाम भी इन्हीं में शामिल है। उनकी अदाकारी इतनी प्रभावशाली थी कि उनके नकारात्मक किरदारों से लोग डरते थे। हालांकि, असल जिंदगी में ललिता एक मेहनती और समर्पित अभिनेत्री थीं।
आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उनके संघर्ष और सफलता की कहानी पर नजर डालेंगे, जिसमें उन्होंने बाल कलाकार से लेकर बॉलीवुड की सबसे 'अत्याचारी सास' बनने तक का सफर तय किया।
ललिता पवार का जन्म 18 अप्रैल 1916 को महाराष्ट्र के नासिक में हुआ। उनका असली नाम अंबा लक्ष्मण राव सगुन था। उनके पिता रेशम के व्यापारी थे और मां गृहिणी। बचपन से ही ललिता को अभिनय का शौक था, और उनके माता-पिता ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने की अनुमति दी।
ललिता ने केवल 9 साल की उम्र में अपनी पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1928) से करियर की शुरुआत की। उस समय भारत में फिल्में मूक युग की थीं, लेकिन ललिता ने छोटी उम्र में ही अपने अभिनय का जादू बिखेरा। बाल कलाकार के रूप में उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, जो उनके फिल्मी सफर की शुरुआत थी।
हालांकि, ललिता की यात्रा आसान नहीं रही। 1942 में आई फिल्म 'जंग-ए-आजादी' की शूटिंग के दौरान एक हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी। एक सीन में को-एक्टर ने उन्हें इतनी जोर से थप्पड़ मारा कि वह गिर गईं, जिससे उनकी आंख की नस फट गई और शरीर के एक हिस्से में लकवा मार गया। इस घटना के कारण उन्हें कुछ वर्षों तक फिल्मों से दूर रहना पड़ा।
लेकिन ललिता ने हार नहीं मानी। उन्होंने खुद को नए किरदारों में ढाला और साइड रोल्स और खलनायिका की भूमिकाओं में अपनी पहचान बनाई। उनकी अदाकारी के चलते दर्शक उन्हें 'अत्याचारी सास' और 'नकारात्मक महिला' के रूप में पहचानने लगे। विशेष रूप से रामानंद सागर की 'रामायण' में मंथरा का किरदार उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ बना।
ललिता पवार ने अपने लंबे करियर में लगभग 700 फिल्मों में काम किया, जिनमें हिंदी, मराठी और गुजराती फिल्में शामिल थीं। उन्होंने अभिनय में इतनी मेहनत की कि उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे लंबे समय तक अभिनय करने वाली महिला अभिनेता के रूप में दर्ज हुआ।
हालांकि, बॉलीवुड में सफलता के बावजूद ललिता का जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। मुंह के कैंसर के कारण उनका निधन 24 फरवरी 1998 को हुआ।