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महबूब खान: भारतीय सिनेमा के दिग्गज का अद्भुत सफर

महबूब खान, भारतीय सिनेमा के एक महान निर्देशक, जिन्होंने 'मदर इंडिया' जैसी कालातीत फिल्में बनाई, की प्रेरणादायक कहानी। उनका सफर संघर्ष और सफलता से भरा रहा। जानें कैसे उन्होंने अपने सपनों को साकार किया और भारतीय सिनेमा को नई पहचान दिलाई।
 

महबूब खान की प्रेरणादायक कहानी


मुंबई, 27 मई। भारतीय फिल्म उद्योग को कालातीत कृतियों जैसे 'मदर इंडिया' देने वाले महबूब खान की जिंदगी किसी फिल्मी कथा से कम नहीं थी। बचपन में उनका फिल्मों के प्रति इतना जुनून था कि वह रोजाना ट्रेन पकड़कर मुंबई और आस-पास के शहरों में फिल्में देखने जाते थे। जब उनके परिवार को इस बात का पता चला, तो उनके पिता ने उन्हें पकड़कर डांटा और वापस गांव ले आए।


फिर भी, उनका फिल्मों के प्रति प्रेम कभी कम नहीं हुआ। यही लड़का आगे चलकर 'मदर इंडिया' जैसी ऐतिहासिक फिल्म का निर्माण करने वाला महान निर्देशक बना।


महबूब खान का जन्म 9 सितंबर 1907 को गुजरात के बड़ौदा के पास सरार गांव में हुआ। उनका परिवार साधारण था और आर्थिक स्थिति भी कमजोर थी। बचपन से ही उन्हें फिल्मों और अभिनय का शौक था। वह चोरी-छिपे ट्रेन में बैठकर आसपास के कस्बों में फिल्में देखने जाते थे और फिर घर लौट आते थे। धीरे-धीरे उनके मन में अभिनेता बनने का सपना मजबूत होता गया।


कहा जाता है कि उनकी दोस्ती एक रेलवे गार्ड से हुई, जिसने उन्हें मुंबई जाकर फिल्मों में किस्मत आजमाने की सलाह दी। महज 16 साल की उम्र में महबूब खान घर छोड़कर मुंबई पहुंचे। हालांकि, उनके पिता को इसकी जानकारी मिल गई और वह उन्हें वापस गांव ले आए। परिवार ने उनकी शादी भी कर दी ताकि उनका ध्यान फिल्मों से हट जाए, लेकिन महबूब खान का सपना खत्म नहीं हुआ।


कुछ समय बाद, वह फिर से मुंबई लौटे। शुरुआती दिनों में उन्होंने काफी संघर्ष किया। वह मुंबई के वीटी स्टेशन के पास ज्योति स्टूडियो के बाहर घंटों खड़े रहते थे ताकि किसी तरह फिल्मों में काम मिल सके। कई रातें उन्होंने रेलवे प्लेटफॉर्म पर बिताईं। अंततः उनकी मुलाकात फिल्मकार अर्देशिर ईरानी से हुई, जिन्होंने उन्हें फिल्मों में छोटे-छोटे रोल दिए। यहीं से उनकी फिल्मी यात्रा की शुरुआत हुई।


शुरुआत में महबूब खान ने जूनियर आर्टिस्ट और सपोर्टिंग एक्टर के रूप में काम किया, लेकिन जल्द ही उन्हें यह एहसास हुआ कि उनकी रुचि निर्देशन और कहानी लिखने में है। उन्होंने अपनी कहानियाँ लिखनी शुरू की और कई प्रोड्यूसर्स के पास गए। शुरुआत में उन्हें निराशा मिली, लेकिन 1935 में उनकी पहली निर्देशित फिल्म 'अल हिलाल' रिलीज हुई, जिसने उन्हें पहचान दिलाई।


इसके बाद उन्होंने 'डेक्कन क्वीन', 'औरत', 'रोटी', 'अनमोल घड़ी', 'अंदाज', 'आन' और 'अमर' जैसी कई सफल फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी फिल्मों में मजबूत महिला किरदारों को विशेष स्थान मिलता था, जिससे उन्हें अपने समय का प्रगतिशील और संवेदनशील फिल्मकार माना जाता है।


1952 में, उन्होंने मुंबई के बांद्रा में महबूब स्टूडियो की स्थापना की, जो उस समय का एक आधुनिक फिल्म स्टूडियो था। आज भी वहां फिल्मों और टीवी शो की शूटिंग होती है।


महबूब खान के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 1957 में आई फिल्म 'मदर इंडिया' मानी जाती है। नरगिस, सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार अभिनीत इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। यह फिल्म ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए भी नामांकित हुई थी। 'मदर इंडिया' को आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे महान फिल्मों में गिना जाता है। 28 मई 1964 को महबूब खान का निधन 56 वर्ष की आयु में हुआ।