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भूपेन हजारिका: असम की आवाज जिसने दुनिया को छू लिया

भूपेन हजारिका, असम की मिट्टी से निकली एक अद्वितीय आवाज, ने न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर संगीत प्रेमियों के दिलों में अपनी जगह बनाई। उनकी आवाज में मिठास और गीतों में समाज की चिंता थी। भूपेन दा ने अपने जीवन में लगभग एक हजार गीत गाए और कई भाषाओं में अपनी आवाज का जादू बिखेरा। जानें उनके संघर्ष, संगीत और समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी के बारे में।
 

भूपेन हजारिका का संगीत और संघर्ष




नई दिल्ली, 7 सितंबर। असम की मिट्टी से निकली एक अद्वितीय आवाज ने न केवल भारत में, बल्कि वैश्विक स्तर पर संगीत प्रेमियों के दिलों में अपनी जगह बनाई। इस आवाज में मिठास थी, गीतों में समाज की गहरी चिंता थी, और उनके अंदाज में अपनी जड़ों से जुड़ाव था। यह आवाज थी भूपेन हजारिका की, जिन्हें 'सुधाकंठ' के नाम से भी जाना जाता था।


भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम के तिनसुकिया में हुआ। संगीत के प्रति उनका लगाव बचपन से ही था, जब उनकी मां शांतिप्रिया ने उन्हें पारंपरिक असमिया संगीत से परिचित कराया। यही संगीत उनकी पहचान बना और उनकी आवाज में असम की संस्कृति और आम लोगों की जिंदगी की झलक दिखाई देने लगी।


उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गुवाहाटी में प्राप्त की और बाद में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की। इसके बाद उन्हें अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अध्ययन करने का अवसर मिला। विदेश में रहने के बावजूद, उनकी जड़ें अपनी मिट्टी से कभी नहीं टूटीं। उनकी रचनाओं में सामाजिक समानता और इंसानियत जैसे मुद्दे बार-बार उभरते रहे।


भूपेन हजारिका की आवाज की गहराई और प्रभाव ने उन्हें एक अलग पहचान दी। 'सुधाकंठ' की उपाधि उन्हें असम के प्रसिद्ध कवि आनंद चंद्र बरुआ से मिली थी। उनके गीतों में केवल सुर और संगीत नहीं, बल्कि समाज की आवाज भी सुनाई देती थी।


उनका संगीत गरीबों, मजदूरों और वंचितों की जिंदगी से जुड़ा था, जिससे उनकी लोकप्रियता केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रही। वे अपने गीतों के माध्यम से लोगों को सोचने और सवाल उठाने के लिए प्रेरित करते थे।


उनके लिए संगीत केवल कमाई का साधन नहीं था; वे इसे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी मानते थे। इसी कारण, बिना अनुमति उनके गीतों को रीमिक्स करने पर वे नाराज होते थे। उनका मानना था कि उनके गीतों में जो सामाजिक संदेश है, उसे कमजोर करने का अधिकार किसी को नहीं है।


हालांकि, वे एक बेहद संवेदनशील इंसान थे। एक बार बिहू उत्सव के दौरान, उन्होंने एक स्थानीय ढोलकिए को मंच के नीचे सोते हुए देखा। भूपेन दा ने उसे देखा और अपनी कार रुकवाकर उसे घर तक पहुंचाया। उनका मानना था कि कला के लिए मेहनत करने वाला हर व्यक्ति सम्मान का हकदार है।


भूपेन हजारिका और लता मंगेशकर के बीच का आपसी सम्मान भी विशेष था। एक बार जब लता मंगेशकर को पता चला कि भूपेन दा बाहर इंतजार कर रहे हैं, तो वह खुद उनका स्वागत करने आईं।


भूपेन हजारिका ने अपने जीवन में लगभग एक हजार गीत गाए और कई भाषाओं में अपनी आवाज का जादू बिखेरा। 'रुदाली' जैसी फिल्मों के संगीत ने उन्हें हिंदी सिनेमा में भी खास पहचान दिलाई। उन्हें पद्म भूषण, दादा साहब फाल्के पुरस्कार और मरणोपरांत भारत रत्न जैसे बड़े सम्मानों से नवाजा गया।


इतनी बड़ी पहचान के बावजूद, भूपेन हजारिका को सादगी पसंद थी। उन्हें भुना हुआ मक्का और लाल लौकी जैसे साधारण असमिया व्यंजन पसंद थे। ये छोटी-छोटी चीजें उन्हें अपनी मिट्टी और अपने लोगों से जोड़े रखती थीं।


हालांकि, उनकी जिंदगी का अंतिम दौर कठिनाइयों से भरा था। गंभीर बीमारी के दौरान उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। एक समय अस्पताल में इलाज के लिए तत्काल ढाई लाख रुपये की जरूरत पड़ी, लेकिन पैसे की व्यवस्था करना मुश्किल हो गया। अंततः उधार लेकर इलाज का खर्च जुटाया गया।


भूपेन हजारिका 2011 में इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी आवाज आज भी जीवित है।