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भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार: सरस्वती देवी की अनकही कहानी

सरस्वती देवी, भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार, ने 1930 के दशक में पुरुषों के वर्चस्व वाले संगीत क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। उनका जन्म 1912 में हुआ और उन्होंने कई प्रसिद्ध हिंदी फिल्मों में संगीत दिया। सरस्वती देवी ने अपने करियर की शुरुआत 1920 में की और 1961 तक सक्रिय रहीं। उनके योगदान ने न केवल फिल्म संगीत को समृद्ध किया, बल्कि उन्होंने समाज के बंधनों को भी चुनौती दी। जानें उनकी प्रेरणादायक यात्रा और संगीत के प्रति उनके समर्पण के बारे में।
 

सरस्वती देवी: भारतीय फिल्म संगीत की पहली महिला


नई दिल्ली, 9 अगस्त। 1930 के दशक में जब फिल्म उद्योग में संगीत का क्षेत्र पुरुषों के अधीन था, तब सरस्वती देवी ने भारतीय फिल्म संगीत की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार माना जाता है।


सरस्वती देवी का जन्म 1912 में एक पारसी परिवार में हुआ था, और उनका असली नाम खोरशेद मिनोचर-होमजी था। संगीत के प्रति उनके प्रेम को देखते हुए, उनके पिता ने उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दिलाई। इसके बाद, उन्होंने लखनऊ के मैरिस कॉलेज से संगीत की पढ़ाई की।


सरस्वती देवी ने 1980 में इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन 1930 और 40 के दशक में उन्होंने कई प्रसिद्ध हिंदी फिल्मों में संगीत दिया। वह बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘अच्युत कन्या’ में अपने संगीत स्कोर के लिए जानी जाती हैं, साथ ही ‘मैं बन के चिरिया बोलू रे’ जैसे लोकप्रिय गीतों के लिए भी।


उनका गायन करियर 1920 में ‘ऑल इंडिया रेडियो’ मुंबई से शुरू हुआ, जहां उन्होंने अपनी बहन मानेक के साथ संगीत प्रस्तुतियां दीं। यह कार्यक्रम, जिसे होमजी सिस्टर्स के नाम से जाना जाता था, काफी लोकप्रिय हुआ। सरस्वती देवी सितार, मैंडोलिन और दिलरूबा भी बजाती थीं।


इस दौरान, उनकी मुलाकात बॉम्बे टाकीज के संस्थापक हिमांशु राय से हुई, जो शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किसी महिला को अपनी फिल्मों के लिए खोज रहे थे। उस समय, महिलाओं का फिल्म उद्योग में काम करना सामाजिक दृष्टि से गलत माना जाता था।


1935 में, सरस्वती देवी को बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो में काम करने का पहला अवसर मिला। उनकी पहली हिट फिल्म ‘अच्युत कन्या’ थी, जिसके बाद उन्होंने फिल्म ‘जन्मभूमि’ में संगीत दिया, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में रिलीज हुई थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा का पहला देशभक्ति गीत ‘जय जय जननी जन्मभूमि’ भी तैयार किया।


सरस्वती देवी और उनकी बहन के काम को पारसी समुदाय ने भी विरोध किया, जिसके कारण उन्हें छिपकर काम करने की आवश्यकता पड़ी। हिमांशु राय ने खोरशेद का नाम बदलकर सरस्वती देवी रखा।


1961 तक, सरस्वती देवी ने फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। उन्हें गाने की रिहर्सल के लिए घंटों बिताने के लिए जाना जाता था। उन्होंने गैर-गायक अभिनेताओं को गाने के लिए प्रशिक्षित किया और बेहतर प्रस्तुति के लिए रिहर्सल कराई।


उनके कई प्रसिद्ध गीतों में ‘बन के चिड़िया’ और ‘मन बावन लो सावन जाया रे’ शामिल हैं। 1941 तक, उन्होंने बॉम्बे टाकीज के साथ काम किया और बाद में स्वतंत्र संगीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई।


सरस्वती देवी ने कभी शादी नहीं की और अकेले अपने अपार्टमेंट में रहीं। एक दिन, वह बस से गिर गईं और उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई। उनके निधन के समय, फिल्म उद्योग की कोई भी हस्ती उनकी मदद के लिए आगे नहीं आई। सरस्वती देवी का 9 अगस्त 1980 को 68 वर्ष की आयु में निधन हो गया।