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बॉलीवुड के जेंटलमैन विलेन: के. एन. सिंह की अनकही कहानी

के. एन. सिंह, बॉलीवुड के एक अद्वितीय खलनायक, ने बिना चिल्लाए अपने किरदारों को जीवंत किया। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ, करियर की शुरुआत, और उनकी प्रमुख फिल्में। उनकी यात्रा में संघर्ष, सफलता और व्यक्तिगत जीवन की झलकियाँ शामिल हैं। क्या आप जानते हैं कि उन्होंने अपने करियर में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया? इस लेख में उनके जीवन के हर पहलू को जानें।
 

के. एन. सिंह: एक अद्वितीय खलनायक



मुंबई, 01 सितंबर (वेब वार्ता)। हिंदी सिनेमा की वैश्विक पहचान में खलनायकों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। इनमें से एक प्रमुख नाम के. एन. सिंह का है, जिनका असली नाम कृष्ण निरंजन सिंह था। वह भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक दौर के मशहूर खलनायकों और चरित्र अभिनेताओं में से एक माने जाते थे।


के. एन. सिंह ने बिना चिल्लाए-चिल्लाए अपने नकारात्मक किरदारों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की कला में महारत हासिल की। उनका जन्म 1 सितंबर 1908 को उत्तराखंड के देहरादून में एक शिक्षित और संपन्न परिवार में हुआ। उनके पिता, चंडी प्रसाद सिंह, एक प्रसिद्ध आपराधिक वकील और कुछ रियासतों के राजा थे।


हालांकि, के. एन. सिंह का सपना भी अपने पिता की तरह कानून की पढ़ाई कर बैरिस्टर बनने का था, लेकिन एक कातिल को बचाने की घटना ने उनके इस पेशे के प्रति जुनून को समाप्त कर दिया।


उनके पिता चाहते थे कि वह जल्दी से अपने पैरों पर खड़े हों, जिसके लिए के. एन. सिंह ने कई व्यवसाय किए, जैसे कि लाहौर में प्रिंटिंग प्रेस स्थापित करना और जंगली जानवरों की आपूर्ति करना। हालांकि, ये सभी प्रयास अंततः सफल नहीं रहे।


एक समय ऐसा आया जब उनके पिता उनके भविष्य को लेकर चिंतित हो गए और के. एन. सिंह का आत्मविश्वास भी गिरने लगा। इसके बाद, 1930 में उनकी शादी आनंद देवी से हुई, जो बाद में बीमारी के कारण निधन हो गईं।


के. एन. सिंह एक प्रतिभाशाली अभिनेता और एथलीट भी थे। 1935 के बर्लिन ओलंपिक में उनकी भागीदारी लगभग तय थी, लेकिन बहन की बीमारी के कारण वह नहीं जा सके। इस दौरान उनकी मुलाकात पृथ्वीराज कपूर से हुई, जिन्होंने उन्हें निर्देशक देबाकी बोस से मिलवाया।


उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1936 में फिल्म 'सुनहरा संसार' से की, जिसमें उन्होंने डॉक्टर का किरदार निभाया। इसके बाद, 1937 में 'बागवान' में खलनायक के रूप में पहचान बनाई।


के. एन. सिंह को 'जेंटलमैन विलेन' के नाम से जाना जाता था। उन्होंने अपने करियर में 200 से अधिक हिंदी फिल्मों में काम किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'बागबान', 'बरसात', 'आवारा', 'बाजी', 'जाल', 'सीआईडी', 'हावड़ा ब्रिज', 'चलती का नाम गाड़ी', 'तीसरी मंजिल', 'हाथी मेरे साथी', और 'डॉन' शामिल हैं। उनकी अंतिम फिल्म 'दानवीर' 20 सितंबर 1996 को रिलीज हुई।


व्यक्तिगत जीवन में, वह छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनकी दूसरी पत्नी प्रवीण पाल भी एक सफल चरित्र अभिनेत्री थीं, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी। उन्होंने अपने छोटे भाई के बेटे को गोद लिया, जो बाद में टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माता बने। के. एन. सिंह का निधन 31 जनवरी 2000 को मुंबई में हुआ।