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नौशाद अली: संघर्ष और सफलता की कहानी, जिनका संगीत आज भी जीवित है

नौशाद अली, भारतीय फिल्म संगीत के एक महानायक, जिनका जन्म 25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में हुआ, ने अपने जीवन में कई संघर्षों का सामना किया। उनके पिता ने संगीत को अपनाने से मना किया, लेकिन उन्होंने अपने सपनों का पीछा किया और मुंबई आ गए। यहां उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की और जल्द ही सफलता की ऊंचाइयों को छुआ। नौशाद ने शास्त्रीय और लोक संगीत का अद्भुत मिश्रण किया, जिससे उन्होंने कई प्रसिद्ध गायकों को नई पहचान दिलाई। उनकी कहानी प्रेरणा और संघर्ष की मिसाल है।
 

नौशाद अली का संगीत सफर


मुंबई, 4 मई। भारतीय फिल्म संगीत के क्षेत्र में कई ऐसे कलाकार हुए हैं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संगीत और रचनाएं हमेशा प्रशंसकों के दिलों में जीवित रहेंगी। उनमें से एक हैं महान संगीतकार नौशाद अली, जिनकी जीवन यात्रा संघर्ष, समर्पण और अद्भुत सफलता की मिसाल है। उनके पिता ने उन्हें संगीत और घर में से एक को चुनने की शर्त रखी थी, और शादी के समय उनके ससुर ने उनके गाने को 'नई पीढ़ी को बर्बाद करने वाला' कहकर नकारा किया था।


5 मई को नौशाद की पुण्यतिथि है। उनका जन्म 25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में हुआ, जब देश में रॉलेट एक्ट के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था। उनके पिता वाहिद अली एक अदालत में मुंशी थे और परिवार संगीत को पसंद नहीं करता था। नौशाद ने बचपन में देवा शरीफ की दरगाह पर कव्वालियां सुनकर संगीत की ओर आकर्षित हुए और लखनऊ में उस्तादों से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली।


नौशाद ने रॉयल थिएटर में साइलेंट फिल्मों के लिए संगीत तैयार करने वाली टीम के साथ काम करना शुरू किया, जहां उन्हें संगीत निर्देशन की असली शिक्षा मिली। उन्होंने हारमोनियम में सुधार भी किया। बाद में, वह इंडियन स्टार थिएटर कंपनी के साथ पंजाब, राजस्थान और गुजरात के दौरे पर गए, जहां उन्होंने विभिन्न लोक संगीत शैलियों को सीखा।


जब नौशाद ने संगीत को अपने करियर के रूप में अपनाने का निर्णय लिया, तो उनके पिता ने स्पष्ट रूप से कहा, 'संगीत और घर में से एक चुन लो।' इस पर नौशाद ने 1937 में लखनऊ छोड़कर मुंबई का रुख किया। शुरुआती दिनों में उन्हें काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा। कुछ समय तक परिचितों के घर रहे और फिर दादर के ब्रॉडवे थिएटर के सामने फुटपाथ पर सोना पड़ा। मुंबई में उन्होंने उस्ताद झंडे खां से संगीत की बारीकियां सीखी और न्यू थिएटर के ऑर्केस्ट्रा में पियानो वादक के रूप में काम करना शुरू किया।


1940 में फिल्म 'प्रेम नगर' से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की। गीतकार डी.एन. मधोक ने उनकी प्रतिभा पर भरोसा जताया। 1942 में फिल्म 'नई दुनिया' और 'शारदा' ने उन्हें पहचान दिलाई। 'शारदा' में 13 साल की सुरैया ने उनके संगीत में गाना गाया था। फिल्म 'रतन' ने उनकी किस्मत बदल दी, जिससे उनकी तनख्वाह 75 रुपए से बढ़कर 25 हजार रुपए हो गई।


एक दिलचस्प किस्सा यह है कि जब नौशाद मुंबई में सफल हो चुके थे, तब भी परिवार को यह नहीं बताया गया था कि वे फिल्मों में संगीतकार हैं। एक निकाह के दौरान लाउडस्पीकर पर उनका गाना 'आंखिया मिला के जिया भरमा के चले नहीं...' बज रहा था। उनके ससुर ने इस गाने को सुनकर नाराजगी जताई और कहा कि ऐसे गाने नई पीढ़ी को बर्बाद कर रहे हैं। नौशाद ने चुप रहकर यह नहीं बताया कि यह गाना उनका ही है।


नौशाद ने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत का अद्भुत मिश्रण फिल्मी संगीत में किया और मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और सुरैया जैसे गायकों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।