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नीतीश भारद्वाज: महाभारत के कृष्ण से लेकर राजनीति तक का सफर

नीतीश भारद्वाज, जो 2 जून 1963 को मुंबई में जन्मे, भारतीय टेलीविजन और सिनेमा के एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं। उन्होंने 'महाभारत' में भगवान श्रीकृष्ण का किरदार निभाकर अपार लोकप्रियता हासिल की। इसके अलावा, उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और उनके करियर के महत्वपूर्ण मोड़।
 

नीतीश भारद्वाज का जीवन परिचय


मुंबई में 2 जून 1963 को जन्मे नीतीश भारद्वाज, भारतीय टेलीविजन और सिनेमा के एक प्रमुख अभिनेता, निर्देशक और पूर्व सांसद हैं। एक साधारण मराठी ब्राह्मण परिवार में जन्मे नीतीश ने अभिनय की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, खासकर भगवान श्रीकृष्ण के किरदार के माध्यम से, जिसने उन्हें लाखों दर्शकों का प्रिय बना दिया।


नीतीश का परिवार भारद्वाज गोत्र से संबंधित है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गोखले एजुकेशन सोसाइटी के डीजीटी हाई स्कूल और रॉबर्ट मनी स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद, उन्होंने बॉम्बे वेटरनरी कॉलेज से वेटरनरी साइंस और एनिमल हसबैंड्री में स्नातक की डिग्री हासिल की, साथ ही विल्सन कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई भी की।


नीतीश ने दो विवाह किए। उनका पहला विवाह 1991 में मोनिषा पाटिल से हुआ, जो 2005 तक चला। इसके बाद, उन्होंने 2009 में स्मिता से शादी की। अभिनेता बनने की इच्छा ने उन्हें मराठी थिएटर से जोड़ा, जहां से उनके अभिनय करियर की शुरुआत हुई।


1988 में बी.आर. चोपड़ा के धारावाहिक 'महाभारत' ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी। केवल 23-24 वर्ष की आयु में, उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का किरदार निभाया और तुरंत ही प्रसिद्धि प्राप्त की। उनकी मधुर आवाज और दिव्य मुस्कान ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद, उन्होंने 'विष्णु पुराण' जैसे अन्य धार्मिक धारावाहिकों में भी भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों को निभाया। 'महाभारत' में उनके किरदार के बाद, उन्हें 'टीवी का कृष्ण' कहा जाने लगा।


टीवी के अलावा, नीतीश ने फिल्म उद्योग में भी अपनी छाप छोड़ी है। उन्होंने कई मराठी फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं और मलयालम सिनेमा में भी काम किया है। हिंदी फिल्मों में, उन्होंने 'केदारनाथ' और 'मोहनजोदड़ो' जैसी फिल्मों में भी अभिनय किया है।


नीतीश केवल अभिनय तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने 1996 में भाजपा के टिकट पर जमशेदपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। हालांकि, 1999 में मध्य प्रदेश की राजगढ़ लोकसभा सीट पर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह के खिलाफ चुनावी मुकाबले में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।