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नंदिता दास की फिल्मी यात्रा: 'फिराक' से 'मंटो' तक का सफर

नंदिता दास ने अपने करियर में कई महत्वपूर्ण किरदार निभाए हैं और निर्देशन की दुनिया में भी कदम रखा। उनकी पहली फिल्म 'फिराक' के बाद उन्होंने निर्देशन से दूरी बना ली थी, लेकिन सआदत हसन मंटो की कहानी ने उन्हें फिर से प्रेरित किया। जानें कैसे नंदिता ने मंटो की जिंदगी पर आधारित फिल्म बनाई और अपने निर्देशन के सफर को फिर से शुरू किया।
 

नंदिता दास का निर्देशन का सफर




मुंबई, 6 नवंबर। अभिनेत्री नंदिता दास ने अपने करियर में हमेशा ऐसे किरदारों और कहानियों का चयन किया है, जो समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डालते हैं। उन्होंने हिंदी के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में भी काम किया है और अपनी गहरी अदाकारी के लिए जानी जाती हैं। लेकिन नंदिता की रुचि केवल अभिनय तक सीमित नहीं रही। उन्होंने निर्देशन की दुनिया में कदम रखा और फिल्म 'फिराक' का निर्माण किया। हालांकि, इस फिल्म के बाद उनका अनुभव इतना निराशाजनक रहा कि उन्होंने दोबारा फिल्म बनाने की कसम खा ली।


उन्हें लगा कि शायद निर्देशन उनके लिए नहीं है। लेकिन कुछ वर्षों बाद, एक लेखक की जिंदगी और उसकी कहानियों ने उन्हें फिर से फिल्म बनाने की प्रेरणा दी। यह लेखक थे सआदत हसन मंटो, जिनकी जिंदगी पर नंदिता ने बाद में फिल्म बनाई।


नंदिता दास ने 2008 में 'फिराक' के साथ फीचर फिल्म निर्देशन की शुरुआत की। यह फिल्म 2002 के गुजरात दंगों के बाद की स्थिति और आम लोगों की जिंदगी पर आधारित थी। इसमें नसीरुद्दीन शाह, परेश रावल, संजय सूरी, दीप्ति नवल और खुद नंदिता दास जैसे कलाकार शामिल थे। फिल्म में दंगों के बाद लोगों के मन में बैठा डर, आपसी अविश्वास और रिश्तों में आई दूरी को दर्शाया गया था। कहानी गंभीर थी और इसे बनाने के लिए नंदिता ने काफी मेहनत की, लेकिन फिल्म को अपेक्षित रिलीज और दर्शकों का समर्थन नहीं मिला।


नंदिता ने कई इंटरव्यू में बताया कि 'फिराक' की खराब वितरण से वह बहुत निराश हुई थीं। फिल्म बनाने में जितनी मेहनत और समय लगाया था, उसके मुकाबले उसे दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर नहीं मिला। इस अनुभव ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि फिल्म के बाद उन्होंने कसम खा ली थी कि अब वह दूसरी फिल्म नहीं बनाएंगी।


हालांकि, नंदिता का फिल्मों से जुड़ाव खत्म नहीं हुआ। वह अभिनय करती रहीं और अन्य गतिविधियों में भी व्यस्त रहीं। इसी बीच, 2012 में उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो की जिंदगी और लेखन पर फिर से चर्चा होने लगी। मंटो की 100वीं जयंती के अवसर पर उनके लेखन और विचारों पर कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। नंदिता ने मंटो के लेख, कहानियां और उनके जीवन से जुड़ी सामग्री पढ़ना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि मंटो की जिंदगी और उनका दृष्टिकोण आज के समाज को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।


नंदिता ने मंटो के विचारों से जुड़ाव महसूस किया और तय किया कि मंटो की जिंदगी पर फिल्म बनानी चाहिए। लेकिन इस बार वह जल्दबाजी नहीं करना चाहती थीं। फिल्म की तैयारी और रिसर्च में उन्हें लगभग पांच साल लगे। उन्होंने मंटो के परिवार के सदस्यों से बातचीत की, उनके जीवन से जुड़े लोगों से जानकारी जुटाई और उन स्थानों का दौरा किया, जहां लेखक ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बिताया।


2018 में उनकी फिल्म 'मंटो' रिलीज हुई, जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने सआदत हसन मंटो की भूमिका निभाई। फिल्म में रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी सफिया का किरदार निभाया। इसके अलावा, ताहिर राज भसीन और ऋषि कपूर जैसे कलाकार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे। फिल्म का प्रीमियर कान्स फिल्म फेस्टिवल में हुआ।


'फिराक' और 'मंटो' के बीच लगभग 10 साल का अंतर था, लेकिन इस दौरान नंदिता ने खुद को केवल निर्देशन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अभिनय किया, लेखन किया और सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी आवाज उठाई। इसके बाद उन्होंने 'ज्विगाटो' का निर्देशन किया, जिसमें कपिल शर्मा और शाहाना गोस्वामी ने अभिनय किया। यह फिल्म गिग इकोनॉमी और डिलीवरी वर्कर्स की चुनौतियों पर आधारित थी।