तपन सिन्हा: भारतीय सिनेमा के संवेदनशील निर्देशक जिनकी फिल्में आज भी हैं प्रासंगिक
तपन सिन्हा का सिनेमा: सामाजिक यथार्थवाद की मिसाल
मुंबई, 14 जनवरी। भारतीय सिनेमा, विशेषकर बंगाली और हिंदी फिल्मों में सामाजिक यथार्थवाद और संवेदनशील कहानी कहने के लिए जाने जाने वाले तपन सिन्हा का नाम किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने रोमांटिक और फॉर्मूला-आधारित सिनेमा की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए नई मिसालें पेश कीं।
उनकी फिल्मों ने समाज को आईना दिखाने का कार्य किया, राष्ट्रीय एकता का संदेश फैलाया और दर्शकों के दिलों में एक स्थायी स्थान बनाया। 15 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि है।
तपन दा का जन्म 2 अक्टूबर 1924 को हुआ था और उन्हें भारतीय सिनेमा के चार महान निर्देशकों में से एक माना जाता है, जिसमें सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन शामिल हैं। उनका फिल्मी सफर साधारण शुरुआत से शुरू हुआ। 1946 में, उन्होंने कोलकाता के न्यू थिएटर्स में साउंड इंजीनियर के रूप में काम करना शुरू किया, जहां उन्हें केवल 70 रुपए महीने का वेतन मिलता था। लेकिन यहीं से सिनेमा की ओर उनका आकर्षण बढ़ा।
1950 में, वह ब्रिटेन के पाइनवुड स्टूडियोज गए, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माण की तकनीक सीखी। भारत लौटने पर, उन्होंने निर्देशन की दिशा में कदम बढ़ाया, जिसमें उनके परिवार और दोस्तों का सहयोग मिला।
तपन दा का रवींद्रनाथ टैगोर के प्रति गहरा लगाव था। स्कूल में एक दिन प्रिंसिपल द्वारा टैगोर की कहानियों को पढ़ने से उनके साहित्य और संगीत के प्रति प्रेम में वृद्धि हुई। उनकी मां रवींद्र संगीत गाती थीं, जिसने उन्हें संगीत का महत्व सिखाया। इस प्रकार, तपन सिन्हा ने सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज सुधार का एक साधन बनाया।
उनकी पहली फिल्म 'अंकुश' 1954 में आई, जो एक हाथी की कहानी पर आधारित थी। लेकिन उनकी असली पहचान 1957 में रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित 'काबुलीवाला' से मिली, जिसने कई पुरस्कार जीते और बर्लिन फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार भी हासिल किया। इसके बाद उन्होंने 'क्षुदीतो पाषाण', 'अपनजन', 'सगीना महतो', 'हाटे बाजारे', और 'सफेद हाथी' जैसी यादगार फिल्में बनाई।
तपन सिन्हा की फिल्मों की विशेषता यह थी कि वे सामाजिक मुद्दों को संवेदनशीलता से उठाते थे। उन्होंने मजदूर अधिकार, पारिवारिक रिश्ते, सामाजिक अन्याय, बच्चों की दुनिया और फैंटेसी जैसे विषयों पर काम किया। 'सगीना' में दिलीप कुमार ने मजदूर नेता का किरदार निभाया। 'एक डॉक्टर की मौत' में उन्होंने वैज्ञानिक की प्रतिभा और नौकरशाही की ईर्ष्या को दर्शाया। बच्चों के लिए 'सफेद हाथी' और 'आज का रॉबिनहुड' जैसी फिल्में बनाकर उन्होंने मनोरंजन के साथ शिक्षा भी दी।
उनकी फिल्में न केवल भारत में, बल्कि बर्लिन, लंदन और मॉस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी सराही गईं। उन्होंने बंगाली, हिंदी और उड़िया भाषाओं में 40 से अधिक फिल्में बनाई। उनके नाम 19 राष्ट्रीय पुरस्कार हैं और 2006 में उन्हें भारत का सर्वोच्च फिल्म सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ।
तपन सिन्हा ने 15 जनवरी 2009 को अंतिम सांस ली।